Bhala kyun deed se tarsa rahe hain

ज़माने पर वो ही तो छा रहे हैं
जो सो कर मर्ज़ी ए रब पा रहे हैं

मलक उनके ही दर पर आ रहे हैं
लिबास ए खुल्द जो मँगवा रहे हैं

जिन्होंने दर जलाया फातिमा का
भला अब वो भी जन्नत जा रहे हैं

बशारत खुल्द की मिलती है ऐसे
लो देखो हुर को वो अपना रहे हैं

जो राहे हक़ में सर कटवा रहे हैं
वो ही नेज़े पा चलकर आ रहे हैं

मुक़द्दर अपना वो चमका रहे हैं
नजफ़ से कर्बला जो जा रहे हैं

अक़ीदत में कमी है कुछ हमारी
यूँ ही वो दीद से तरसा रहे हैं