Kaunsa Husn Shah Ke Lal Main Hai

ज़ालिम ए वक़्त किस ख़याल में है
ज़ुल्म तो खुद बा खुद ज़वाल में है

आने वाला है दौर हैदर का
शैख़ अब तक इसी मलाल में है

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चाँद-सूरज में नूर किसका है
किसका जल्वा हर इक जमाल में है

हुस्न ए यूसुफ ये देखता होगा
कौनसा हुस्न शह के लाल में है

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उसकी हिम्मत का हाल क्या कहिए
भागना जिसकी हर मिसाल में है

एक बुढ्ढे का ग़ार में रोना
पूरा क़िस्सा इसी मिसाल में है

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जितने आये थे सब हैं सकते में
शेरे नर है जो बस जलाल में है

एक खत ही तो पार करना है
इतनी हिम्मत किसी के लाल में है

Izzat Mili Hussain ko Har Khaas-o-Aam Main

थी जितनी खूबियाँ भी रसूले अनाम में
उन सबको रब ने रख दिया बारा इमाम में

पहले वज़ू किया है हमारे खयाल ने
तब नाम ए मुस्तफा को लिखा है कलाम में

खुद सा बता रहे हो नबी को जो शेख जी
लम्बे फसोगे रख लो ज़बां को लग़ाम में

मुनकिर इमामतों का भी जन्नत में जायेगा
ऐसा तो कुछ नहीं है इलाही निज़ाम में

है ज़िक्र ए अहले बैत ही हर जा खुदा के साथ
सजदे में भी रुकू में क़ुनूत ओ सलाम में

उम्मे अबीहा जिसको समझना मुहाल हो
ये देख ले खड़े हैं नबी ऐहतराम में

हारिस पे गिर के अर्श से पत्थर ने ये कहा
शक हो गया था इसको खुदा के कलाम में

ए हुर ये मोज़ेज़ा है इमाम ए हुसैन का
आता है तेरा नाम अलयहिस्सलाम में

कार्बोबला से हट के सफर हो तो लाईए
हज का सवाब हो जहाँ हर एक गाम में


रोज़ा नमाज़ करके भी कुछ फायदा नहीं
जब तक समझ नहीं है हलाल-ओ-हराम में

जिसने नबी की बेटी के घर को जला दिया
वो भी ख़लीफ़ा हो गया देखो अवाम में


ज़ैनब ने अपने ख़ुत्बे से सबको बता दिया
इज़्ज़त मिली हुसैन को हर ख़ास-ओ-आम में

क़ैदी समझ रहा है, तेरी भूल है यज़ीद
मैं शाम करने आई हूँ दरबार-ए-शाम में

Hamari Rooh Ke Andar Hussain Rehta Hai

अगर ये पूछो कहाँ पर हुसैन रहता है
हमारी रूह के अंदर हुसैन रहता है

हमारी आँखों में कर्बोबला के मंज़र हैं
दिलों में सिब्ते पयम्बर हुसैन रहता है

घरों में अपने ख़ुशी हो या कोई ग़म हो कभी
शऊर ओ फ़िक्र का मसदर हुसैन रहता है

खुदा को सजदा नबी का था एक ऐसा भी
के जिसमें फ़िक्र का महवर हुसैन रहता है

सहाबियों ने वो सजदा तो खूब देखा है
नबी की पुश्त के ऊपर हुसैन रहता है

ज़माने भर ने शहादत के बाद देख लिया
कटा के सर भी सुखनवर हुसैन रहता है

यज़ीदियत तो ज़माने से मिट गयी कब की
जहाँ में आज भी घर घर हुसैन रहता है

ये कर्बला है यहाँ तख्तो ताज झुकते हैं
यहाँ पे दीन का रहबर हुसैन रहता है

तमाम रात यही सोच कर कटी हुर की
कि जाए कैसे जहाँ पर हुसैन रहता है

यही बताने को हुर छोड़ कर इधर आया
कहाँ है ज़ुल्म, कहाँ पर हुसैन रहता है

ज़ुहैर पूछे कोई तो उसे बता देना
हमारी रूह के अंदर हुसैन रहता है

Har Saans Tera Zikr Sare Daar Kare Hai

दिल अश्क़ो से कुछ इस तरह यलग़ार करे है
हर ज़ुल्म के हमले को ही बेकार करे है

है कौन मुजाहिद भी हो और सीना सिपर भी
डरता ही ना हो वार पे बस वार करे है

मीसम की तरह कौन है जो कर के दिखाए
हर साँस तेरा ज़िक्र सरे दार करे है

ज़ुल्मत को मिटाने के लिए जान दी हमने
है कोई जो इस बात से इंकार करे है

इस्लाम का चेहरा उसे हरगिज़ ना समझना
जो खाना ए काबा से भी व्यापार करे है

क्यों कर तुम्हें मंज़ूर हुई ऐसी क़यादत
करती है अमल वो के जो बद कार करे है

ये कह दो ज़ुहैर अब भी ज़माने से सुधर जाए
क्यों अपनी इबादत को यूँ मिस्मार करे है


है कोई जो इस बात से इंकार करे है
अब्बास भी हैदर की तरह वार करे है

सिफ़्फ़ीन में अब्बास ने ये कर के दिखाया
ये एक के दो और दो हों तो फिर चार करे है

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हैदर से अदावत तुझे बेकार करे है
क्यों अपने ही पैरों पे तू खुद वार करे है

रखता ही नहीं उल्फ़ते हैदर तू ज़रा सी
और कहता है सरकार से तू प्यार करे है

क्या हक़ है बराबर में दफ़न होने का उसको
हमराह जो गर ग़ार में हो ज़ार करे है

क्यों नारा ए हैदर से अदावत है बता फिर
क्या क़ातिल ए ज़ेहरा से भी तू प्यार करे है

जो ख़ुद को नबी जैसा बताने पे तुला है
गोया कि नबूअत का भी इंकार करे है

दम नादे अली करती है जब शीर पिलाए
माँ गोदी में तैयार अज़ादार करे है

इस वास्ते भी नादे अली माँ ने सिखाई
मजधार में कश्ती को अली पार करे है

तुम देखना जन्नत में ज़ुहैर आएगा वो ही
जो इनके दुशमनों पे बे शूमार करे है

Kulsoom ki Midhat main zaban khol rahi hun

कुलसूम की मिदहत में ज़बाँ खोल रही हूँ
यानी मैं फ़ज़ाओं में महक घोल रही हूँ

ज़ेहरा की दुलारी के क़सीदे को सुना कर
अलफ़ाज़ की क़िस्मत है जो मैं खोल रही हूँ

कुलसूम हूँ, कुलसूम हूँ, कुलसूम हूँ लोगों
ख़ामोश हूँ मैं लब से मगर बोल रही हूँ

हमराह तो ज़ैनब के चली हूँ मैं बराबर
हर दर्द को सीने में मगर घोल रही हूँ

ज़ैनब ने तो ख़ुत्बों से हराया है सितम को
हर ज़ुल्म की पहचान को मैं खोल रही हूँ

अहमद की नवासी हूँ मैं ज़हरा की दुलारी
और हक़ में अली के बड़ी अनमोल रही हूँ

कुलसूम की मिदहत में फ़िज़ा लगता है जैसे
हर साँस मैं बस नाम ए अली बोल रही हूँ

Hoton pa mere shahe khurasan ki sana hai

ये जश्न ए रज़ा जश्न ए रज़ा जश्न ए रज़ा है
इस जश्न में हर लम्हा इबादत का मज़ा है

लगता है मुझे हक़ में मेरे माँ की दुआ है
होटों पे मेरे शाहे खुरासां की सना है

बैअत का तलबगार हुआ फिर से ज़माना
ईरान भी इंकार ए हुसैनी पे डटा है

सेहरा हो तराई हो हवा हो के ज़मी हो
ईरान की हैबत का असर बोल रहा है

क्या हादसे दुनिया के डराएंगे ज़ुहैर अब
बाज़ू पा मेरे मौला का तावीज़ बंधा है

Sila Madh-e-Hasan Ka Paa Rahe Hain

यक़ी जिनको नहीं वो आ रहे हैं
वो ही तो क़ोम को भटका रहे हैं

अज़ानों और अक़ामत पर भी झगडे
तमाशा कोम का बनवा रहे हैं

फ़क़त भूके हैं और प्यासे हैं दिन भर
ये रोज़े क्या हमें सिखला रहे हैं

अना को छोड़ दें आओ सभी हम
हसन भी तो ये ही समझा रहे हैं

सजा है जश्न सिब्ते मुस्तफा का
अली ओ फातिमा खुद आ रहे हैं

मोहम्मद को जो अब्तर कह रहे थे
हसन को देख कर घबरा रहे हैं

ये फन देखो ज़रा सुल्ह ए हसन का
क़लम से सर उड़ाए जा रहे हैं

शऊर ओ अज़्म में इल्मो अमल में
अली वाले सदा आला रहे हैं

हमारे हौसले दुनिया से पूछो
अकेले हो के भी हड़का रहे हैं

यक़ीनी मौत फिर टूटेगी सर पर
अभी तो बस तुम्हें समझा रहे हैं

Bhala kyun deed se tarsa rahe hain

ज़माने पर वो ही तो छा रहे हैं
जो सो कर मर्ज़ी ए रब पा रहे हैं

मलक उनके ही दर पर आ रहे हैं
लिबास ए खुल्द जो मँगवा रहे हैं

जिन्होंने दर जलाया फातिमा का
भला अब वो भी जन्नत जा रहे हैं

बशारत खुल्द की मिलती है ऐसे
लो देखो हुर को वो अपना रहे हैं

जो राहे हक़ में सर कटवा रहे हैं
वो ही नेज़े पा चलकर आ रहे हैं

मुक़द्दर अपना वो चमका रहे हैं
नजफ़ से कर्बला जो जा रहे हैं

अक़ीदत में कमी है कुछ हमारी
यूँ ही वो दीद से तरसा रहे हैं

Madar-e-Fatima Khadija Hain

क्या कहूं तुमसे क्या खदीजा हैं
नूर-ए-राह-ए-हुदा खदीजा हैं

हम सर ए मुस्तफा खदीजा हैं
मादर ए फातिमा खदीजा हैं

दीन मोहसिन है मोमिनो सच है
दीन की मोह सिना खदीजा हैं

मालो दौलत लुटाई है दीं पर
अस्ल-ए-ख़ैर-ओ-अता ख़दीजा हैं

माल ही क्या, थी जान भी हाज़िर
अज़्म की इंतिहा ख़दीजा हैं

थी जो मूनिस नबी की हर लम्हा
नूर ए सब्र ओ रज़ा खदीजा हैं

इंतिहा ये ज़ुहैर अज़मत की
पहली जो मोमिना, खदीजा हैं

Hasan Noor-e-Khuda Ki Raushni hai

नबी से इश्क़ ओ उल्फत, आगही है
नबी पर जान देना, ज़िन्दगी है
नबी का हर अमल, रब की वही है
नहीं इनकी नहीं, रब की नहीं है

नबी का जा नशी वाहिद अली है
अली जैसा नहीं कोई नहीं है

अली हर हाल में हक़ का वली है
अली के नाम से मुश्किल टली है
अली ने तो मदद नबियों की की है
अली का ज़िक्र रब की बंदगी है

अली जिसको समझ आता नहीं है
खता ये माँ की है उसकी नहीं है

मेरी माँ ने मुझे ये सीख दी है
नहीं दिल में अली तो तीरगी है
सहारा बे सहारों का अली है
हर एक ग़म की दवा नादे अली है

बशर गिरते हुआ गिरता नहीं है
कहा बेसाख्ता जब या अली है

मदीने में ये ही होता था अक्सर
नबी को लोग कुछ कहते थे अब्तर
ये ताना बार था अहमद के दिल पर
लिए मायूस दिल आये जो घर पर

कहा ख़ालिक़ ने ए जिब्रील जाओ
मेरे मेहबूब को कौसर सुनाओ

लिए जिब्रील कौसर आए दर पर
कहा मायूस ना हों ए पयम्बर
खुदा ने आपको भेजा है कौसर
कहा जिसने रहेगा वो ही अब्तर

नबूअत जो खतम तुम पर करुंगा
तुम्हारे लाल मैं ज़ेहरा को दूँगा

वो ज़ेहरा जो के है उम्मे अबीहा
है सर पर ताज ख़ातूने जिना का
नबी की नस्ल को जिसने चलाया
जहाँ में नाम है दो लाडलों का

इमामत इनके आँगन में पली है
विलायत जिनसे दुनिया को मिली है

हसन जाने अली सिब्ते नबी है
हसन खुद भी वली इब्ने वली है
हसन जैसा किसी का हुस्न भी है
हसन नूर ए खुदा की रौशनी है

मलक इनके ही दर पर आ रहे हैं
लिबास ए खुल्द ये मँगवा रहे हैं

हसन ने सुल्ह कर के दीं बचाया
किया वो वार कुछ भी बच ना पाया
अमीर ए शाम को क़ैदी बनाया
क़लम की नोक से यूँ सर उड़ाया

ज़ुहैर इस सुल्ह की हिकमत यही है
सितम का धड़ कहीं गर्दन कहीं है


हसन कुल आयत ए रब्बे जली है
हसन को याद करना बंदगी है

हसन नूर-ए-ख़ुदा की रौशनी है
हसन सब्र-ओ-वफ़ा की ज़िन्दगी है

हसन जो फातिमा का दिल नशीं हैं
हसन जान ए दिल ए मौला अली है

नबी गोदी में लेकर देखते हैं
हसन में किस क़दर की दिलकशी है

ना करना जंग ये बतला रहा है
हसन की राह अम्न-ओ-आश्ती है

है हिकमत और अमल दोनों बराबर
हसन की सुल्ह भी सुल्ह ए नबी है

नक़्शे पा इनकी सखावत का चलन है
हसन खुद भी सखी इब्ने सखी है

सभी सुन ले ये आशिक़ माविया के
सुलह को तोड़ देना बुज़दिली है

ज़ुहैर इस सुल्ह की हिकमत यही है
सितम का धड़ कहीं गर्दन कहीं है