वहीं तो फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा बे-हिसाब होता है
फ़िज़ा में अम्बर ओ मुश्क ओ गुलाब होता है
फ़रिश्ते आके उसी दर पे फख्र करते हैं
जहाँ भी जिक्रे रिसालत मआब होता है
दरे नबी की ग़ुलामी का ये शरफ़ देखो
मलक भी आके यहीं फ़ैज़याब होता है
नबी के रद्दे अमल से ही सीख ले दुनिया
करो जो सब्र तो फिर इंक़लाब होता है
हैं शहर ए इल्म नबी उसका दर अली मौला
बे इज़्न शहर में जाना खराब होता है
लबों पे नाम नबी का दिलों में बुग़ज़े अली
सवाब सारा का सारा अज़ाब होता है
खुदा के बाद नबी हैं नबी के बाद अली
ये याद रखना हिसाबो किताब होता है
ज़ुहैर नाते नबी है, ये बा वज़ू लिखना
हर एक लफ्ज़ भी इसमें गुलाब होता है