आला ये घराना था, आला ये घराना है
हर दौर ने माना था, हर दौर ने माना है
परदे में अभी क़ायम अहमद की निशानी है
रौशन वो ज़माना था, रौशन ये ज़माना है
है कैसा मुसलमां वो, पढ़ता है नमाज़ें तो
अहमद की ना माना था, हैदर को ना माना है
जिब्रील हों, काबा हो, मस्जिद हो या मिम्बर हो
हैदर का दिवाना था हैदर का दिवाना है
अव्वल तुम्हें आना है, आखिर तुम्हें आना है
कल कलमा पढ़ाया था, अब पर्दा उठाना है
तौहीद बताने को फिर उसको बचाने को
अव्वल तुम्हें आना है आखिर तुम्हें आना है
मजलिस का तबर्रुक हो, अश्क-ए-ग़म-ए-सर्वर हो
अनमोल खज़ाना था अनमोल खज़ाना है
ज़हरा ओ अली, शब्बर-शब्बीर के क़ातिल का
अंदाज़ ज़नाना था अंदाज़ ज़नाना है
आपस में लड़ाए वो, या बाग़े फ़िदक लूटे
दोज़ख में ही जाना था दोज़ख में ही जाना है
ये काम बड़े लेकर आये हैं अली असग़र
बैअत को हराना था, ज़ालिम को रुलाना है
हर दौर के मरजा पर, या फ़र्श-ए-ग़म-ए-शह पर
ज़ालिम का निशाना था ज़ालिम का निशाना है
क्यों उनको बुलाना है आना ही नहीं जिनको
कल कोई बहाना था अब कोई बहाना है
हर दौर में ये सबकी नस्लों का पता देगा
खैबर में जो पाया था, नारा वो लगाना है
कहता है ज़ुहैर अब भी ग़ाज़ी का अलम हमसे
सर को ना झुकाया था सर को ना झुकाना है