अली को लाना है अपने घर में
खुदा का भी एहतिराम क्या है
जो दर नहीं तो दिवार हँस कर
बताएगी के इमाम क्या है
अली को लाना है अपने घर में
खुदा का भी एहतिराम क्या है
जो दर नहीं तो दिवार हँस कर
बताएगी के इमाम क्या है
ये ज़िक्र रहे क़ायम जब जब भी जहाँ पर हो
अब जल्द वो मुसल्ला भी आबे रवाँ पर हो
जब पर्दा उठे या रब, और महदी नुमायाँ हों
मिदहत अली असग़र की बस मेरी ज़बाँ पर हो
पैदाइश ए असग़र का मक़सद ही शहादत है
फिर क्यों ना तेरी हैबत ही तीरो कमाँ पर हो
ख़ामोश लबों में भी जब इतना असर है तो
मिदहत अली असग़र की बस मेरी ज़बाँ पर हो
बक़ाए मक़सद ए शब्बीर में रहीं शामिल
तुम्हारे लफ्ज़ भी आगे ना आए ज़ैनब से
फ़ज़ीलतों में फ़ज़ीलत जुदा ये है कुलसूम
खड़ी हो काँधे से काँधा मिलाए ज़ैनब से
हम जो ज़िक्रे इमाम करते हैं
क़द से ऊँचा ये काम करते हैं
ज़िकरे मौला का फैज़ तो देखो
सिन रसीदा सलाम करते हैं
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क़द से ऊँचा वो काम करते हैं
जो भी ज़िक्रे इमाम करते हैं
उनका सब एहतिराम करते हैं
जो सिना से कलाम करते हैं
दार पर जा के मीसमे तम्मार
ज़िक्रे हैदर को आम करते हैं
आने वाले हैं ग़ैब से मौला
क्या कोई इंतज़ाम करते हैं
मर्सिया नोहा मन्क़बत खानी
आम शह का पयाम करते हैं
नारा हैदर का हम लगा के ज़ुहैर
रुख़ पे मुनकिर के शाम करते हैं
लबों पे अपने सजाया है नाम बाक़िर का
है मुझको नाज़ के मैं हूँ ग़ुलाम बाक़िर का
इमाम पांचवे है कर्बला के क़ैदी भी
ज़माना इस लिए भी है ग़ुलाम बाक़िर का
یہ شہادت جو ہو گی لوگوں
موت بھی روتی رہ گئی لوگوں
ایک آواز جو باطل کا دل ہلاتی تھی
اب و خاموش ہو گی لوگوں
حوصلہ حیدر کررار سے لے کر ایران
کیا بھلا وار وو اس پار نہیں کر سکتا
جیتنا جنگ تیرے بس میں نہیں ہے ظالم
تو تو ایک وار بھی بیکار نہیں کر سکتا
سجی محفل ہیں مسرّت کا دن ہے
امام زمانہ سے قربت کا دن ہے
درود سلامت کے تحفے سجاؤ
حسن اسکری کی ولادت کا دن ہے
دل کے ارمان رہ گئے ان کے
اب تو بس ہاتھ ملتے رہتے ہیں
جب سے اے شیخ جی خم سے
دن میں تارے دکھایی دیتے ہیں
ریسی آپکا جانا بڑا خلیگا ہمیں
وزیر آپ سا اب پھر کہاں ملیگا ہمیں
میرے امام نے ملنے تمہیں بلایا ہے
سجیگا جشنے رضا تو یہ ہی کہیگا ہمیں