Taqve Ne Inke Dar Se Muqaddar Bana Liya

दर पर तक़ी के जिसने भी सर को झुका लिया
बिगड़ी हुई हयात को उसने बना लिया

फ़ज़्ले खुदा से अपना मुक़द्दर जगा लिया
जशने तक़ी में आके क़सीदा सुना लिया

आमद हुई है मौला तक़ी की जहाँ में आज
यानी इमामतों ने नवें दर को पा लिया

बचपन से ही वक़ारे इमामत की शान है
तक़वे ने इनके दर से मुक़द्दर बना लिया

कम सिन थे जब के इल्म ए इमामत के सामने
बातिल के हर सवाल ने मुँह को छुपा लिया

मुट्ठी जो बंद की थी वो खुलना था खुल गई
बातिल ने खुद को खुद से ही रुसवा करा लिया

हर बार आज़माता था मामून इल्म से
हर बार इल्मे मौला तक़ी ने हरा लिया

दरबार में जो इल्म की बातें अयाँ हुई
बातिल खमोश हो गया सर को झुका लिया

इल्मे खुदा का बहता समंदर इमाम हैं
हमने तो मोती रोल लिए तुमने क्या लिया

बाबुल मुराद भी हैं ये जव्वाद भी यही
मैंने दुआ में नाम ए तक़ी बारहा लिया

अकबर अली में जशने तक़ी रात भर हुआ
इश्क़ ए तक़ी की गर्मी ने सबको समा लिया

तुझ पर ज़ुहैर इनकी अता है ये बा खुदा
मिदहत से इनकी लफ्ज़ को मोती बना लिया