कुलसूम की मिदहत में ज़बाँ खोल रही हूँ
यानी मैं फ़ज़ाओं में महक घोल रही हूँ
ज़ेहरा की दुलारी के क़सीदे को सुना कर
अलफ़ाज़ की क़िस्मत है जो मैं खोल रही हूँ
कुलसूम हूँ, कुलसूम हूँ, कुलसूम हूँ लोगों
ख़ामोश हूँ मैं लब से मगर बोल रही हूँ
हमराह तो ज़ैनब के चली हूँ मैं बराबर
हर दर्द को सीने में मगर घोल रही हूँ
ज़ैनब ने तो ख़ुत्बों से हराया है सितम को
हर ज़ुल्म की पहचान को मैं खोल रही हूँ
अहमद की नवासी हूँ मैं ज़हरा की दुलारी
और हक़ में अली के बड़ी अनमोल रही हूँ
कुलसूम की मिदहत में फ़िज़ा लगता है जैसे
हर साँस मैं बस नाम ए अली बोल रही हूँ