Bade Aashoor Tha Zainab Ka Ye Noha Abbas

Tamheed:
क़त्ल शब्बीर हुए, अहले हराम क़ैद हुए
एक रस्सी में ही जब बांधे गए सबके गले
बे कजावा सरे बाज़ार जो ऊंटों पा लिए
सर भी नेज़ों प् शहीदों के उठा वो चले
इस क़दर ग़म थे के ज़ैनब से भी रोका ना गया
फट गया ग़म से जिगर रो के ये ज़ैनब ने कहा

Nauha
बादे आशूर था ज़ैनब का ये नौहा अब्बास
तेरे ही दम से था बाक़ी मेरा परदा अब्बास

कर्बला हमको ज़रा रास ना आई भाई
लुट गई ज़ैनब ए नाशाद दुहाई भाई
छिन गया हाए मेरा मुझसे सहारा अब्बास
बादे आशूर था ज़ैनब का ये नौहा अब्बास

तेरे जाने से क़यामत पे क़यामत आई
मैं हूँ पाबंद ए रसन और सिना पर भाई
किस तरह तुमको भला है ये गवारा अब्बास
बादे आशूर था ज़ैनब का ये नौहा अब्बास

मेरी चादर भी गई, और सरो सामान लुटा
कट गए हाथ तेरे मश्क पे भी तीर लगा
पानी तो आ न सका, ख़ून में डूबा अब्बास
बादे आशूर था ज़ैनब का ये नौहा अब्बास

खौफ आता है मुझे कैसा समाँ है रन में
कुछ नज़र आता नहीं सिर्फ धुआँ है रन में
मैंने हर गाम तेरा नाम पुकारा अब्बास
बादे आशूर था ज़ैनब का ये नौहा अब्बास

किसको आवाज़ दूँ अब, कौन सहारा देगा
कौन शब्बीर के बच्चों को दिलासा देगा
काश इस वक़्त मेरा होता सहारा अब्बास
बादे आशूर था ज़ैनब का ये नौहा अब्बास

तेरे बाज़ू पे भरोसा था मेरे भाई मुझे
साथ बच्चे हैं डराती है ये तन्हाई मुझे
दूर तक भी तो नहीं कोई हमारा अब्बास
बादे आशूर था ज़ैनब का ये नौहा अब्बास

मक़सद ए शह को बचा लाऊँ वो ताक़त दो मुझे
आओ अब शाम के दरबार में हिम्मत दो मुझे
हाय ज़ालिम ने मेरा नाम पुकारा अब्बास
बादे आशूर था ज़ैनब का ये नौहा अब्बास

याद ए शब्बीर है और सीनो में ग़म है तेरा
आज तो ग़ैरों के घर में भी अलम है तेरा
हश्र तक रोयेगा तुमको ये ज़माना अब्बास
बादे आशूर था ज़ैनब का ये नौहा अब्बास

सारी दुनिया को तेरी याद दिलाता है ज़ुहैर
कर्बला क्या है ज़माने को बताता है ज़ुहैर
अश्क आँखों में लिए लिखता है नौहा अब्बास
बादे आशूर था ज़ैनब का ये नौहा अब्बास

Roi Abbas Ko De De Ke Duhai Zainab

दश्त में ख़ाक-ए-सितम ओढ़ के आई ज़ैनब
रोई अब्बास को दे-दे के दुहाई ज़ैनब

भा गयी कैसे तराई मेरे भाई तुमको
क्या सकीना की ज़रा याद ना आई तुमको
क्यों नहीं सुनते हो, देती है दुहाई ज़ैनब
रोई अब्बास को दे-दे के दुहाई ज़ैनब

जब से दरिया पा गए हो ना पलट कर आए
पानी आए या ना आए मेरा भाई आए
अब कहाँ ढूंढेगी तुझको मेरे भाई, ज़ैनब
रोई अब्बास को दे-दे के दुहाई ज़ैनब

मैंने देखा है सर-ए-शाह-ए-हुदा कटते हुए
चादरें छिनते हुए हाय हरम लुटते हुए
किस तरह भूल सकेगी ये तबाही ज़ैनब
रोई अब्बास को दे-दे के दुहाई ज़ैनब

जलते खेमों से इमामत को बचाया मैंने
उजड़े कुनबे को हर एक गाम संभाला मैंने
ढूंढने बन में सकीना को भी आई ज़ैनब
रोई अब्बास को दे-दे के दुहाई ज़ैनब

हौसला देती थी सबको मैं नहीं रोती थी
जब बंधे हाथ तो बस तुमको सदा देती थी,
बे कफ़न लाश थी कुछ कर भी ना पाई ज़ैनब
रोई अब्बास को दे-दे के दुहाई ज़ैनब

हाय हर मोड़ पे एक ताज़ा मुसीबत आई
बे रिदा हमको फिराया गया दर दर भाई
फिर भी शिकवा कोई लब पर नहीं लाई ज़ैनब
रोई अब्बास को दे-दे के दुहाई ज़ैनब

Gham-e-Hussain Main Ashkon ki Zindagi Kya Hai

ग़म-ए-हुसैन में अश्कों की ज़िंदगी क्या है
बता रहे हैं ज़माने को बंदगी क्या है

ग़मे हुसैन मिला है खुदा का शुक्र करो
बताओ नस्लों को ज़ेहरा की नौकरी क्या है

जो हक़ है मातम-ए-सरवरؑ का वो बताते रहो
ज़माना इतना बुरा है कि दो घड़ी क्या है

हुसैनؑ नाम है जिसका, नबी का लाल है वो
बग़ैर-ए-इश्क़-ए-शाह-ए-दीन, तो आदमी क्या है

जो कर्बला में इकहत्तर हुसैन वाले थे
बता गए वो ज़माने को बंदगी क्या है

अली के लाल ने नेज़े पे भी नमाज़ पढ़ी
अब और कैसे बताऊँ तुम्हें वली क्या है

चले जो झूले से असग़र खते क़दम ना दिया
ज़माना ढूंढने निकला के पैरवी क्या है

हुसैन ही तो फ़क़त दीन के मुहाफ़िज़ हैं
न हो हुसैन तो ये दीन, दीन ही क्या है

ज़ुहैरؔ लब पे रहे बस यही दुआ हर दम
हुसैनؑ इश्क़ है, इस इश्क़ की कमी क्या है

Har Saans Tera Zikr Sare Daar Kare Hai

दिल अश्क़ो से कुछ इस तरह यलग़ार करे है
हर ज़ुल्म के हमले को ही बेकार करे है

है कौन मुजाहिद भी हो और सीना सिपर भी
डरता ही ना हो वार पे बस वार करे है

मीसम की तरह कौन है जो कर के दिखाए
हर साँस तेरा ज़िक्र सरे दार करे है

ज़ुल्मत को मिटाने के लिए जान दी हमने
है कोई जो इस बात से इंकार करे है

इस्लाम का चेहरा उसे हरगिज़ ना समझना
जो खाना ए काबा से भी व्यापार करे है

क्यों कर तुम्हें मंज़ूर हुई ऐसी क़यादत
करती है अमल वो के जो बद कार करे है

ये कह दो ज़ुहैर अब भी ज़माने से सुधर जाए
क्यों अपनी इबादत को यूँ मिस्मार करे है


है कोई जो इस बात से इंकार करे है
अब्बास भी हैदर की तरह वार करे है

सिफ़्फ़ीन में अब्बास ने ये कर के दिखाया
ये एक के दो और दो हों तो फिर चार करे है

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हैदर से अदावत तुझे बेकार करे है
क्यों अपने ही पैरों पे तू खुद वार करे है

रखता ही नहीं उल्फ़ते हैदर तू ज़रा सी
और कहता है सरकार से तू प्यार करे है

क्या हक़ है बराबर में दफ़न होने का उसको
हमराह जो गर ग़ार में हो ज़ार करे है

क्यों नारा ए हैदर से अदावत है बता फिर
क्या क़ातिल ए ज़ेहरा से भी तू प्यार करे है

जो ख़ुद को नबी जैसा बताने पे तुला है
गोया कि नबूअत का भी इंकार करे है

दम नादे अली करती है जब शीर पिलाए
माँ गोदी में तैयार अज़ादार करे है

इस वास्ते भी नादे अली माँ ने सिखाई
मजधार में कश्ती को अली पार करे है

तुम देखना जन्नत में ज़ुहैर आएगा वो ही
जो इनके दुशमनों पे बे शूमार करे है

Kulsoom ki Midhat main zaban khol rahi hun

कुलसूम की मिदहत में ज़बाँ खोल रही हूँ
यानी मैं फ़ज़ाओं में महक घोल रही हूँ

ज़ेहरा की दुलारी के क़सीदे को सुना कर
अलफ़ाज़ की क़िस्मत है जो मैं खोल रही हूँ

कुलसूम हूँ, कुलसूम हूँ, कुलसूम हूँ लोगों
ख़ामोश हूँ मैं लब से मगर बोल रही हूँ

हमराह तो ज़ैनब के चली हूँ मैं बराबर
हर दर्द को सीने में मगर घोल रही हूँ

ज़ैनब ने तो ख़ुत्बों से हराया है सितम को
हर ज़ुल्म की पहचान को मैं खोल रही हूँ

अहमद की नवासी हूँ मैं ज़हरा की दुलारी
और हक़ में अली के बड़ी अनमोल रही हूँ

कुलसूम की मिदहत में फ़िज़ा लगता है जैसे
हर साँस मैं बस नाम ए अली बोल रही हूँ