Bas Meri Zaban Par Ho Midhat Ali Asghar Ki

अब कैसे भला होगी मिदहत अली असग़र की
जब फूल चुरा लाए कुदरत अली असग़र की

मुस्कान खुदा तूने फूलों को अता कर दी
बस मेरी ज़बाँ पर हो मिदहत अली असग़र की

शब्बीर सर-ए-मैदाँ बेशीर यूँ लाए हैं
दुनिया को दिखानी थी क़ुदरत अली असग़र की

तलवार नहीं फिर भी असग़र का हुनर देखो
नौ लाख पे छाई है हैबत अली असग़र की

छह माह के सिन में ही ज़ालिम को रुला डाला
क्या होती जवाँ होकर ताक़त अली असग़र की

जब नाम-ए-अली असग़र मैं लब पे सजाता हूँ
साँसों से भी आती है निकहत अली असग़र की

लरज़े में ज़मीं रहती ये ताब ना ला पाती
तनहा जो अगर होती तुरबत अली असग़र की

वो कौन सा बचपन है जो सदियों पे भारी है
छह माह का सिन शह की नुसरत अली असग़र की

वो शक्ल क़सीदे की लेती है ज़ुहैर अक्सर
लबरेज़ हुई जब भी उल्फत अली असग़र की

Shaan Hai Besheer Main Sab Haider-e-Karrar Ki

क्या ज़रूरत हो भला बेशीर की हथियार की
ज़ालिमों पर छाई है हैबत लबों के वार की

दो लबों से ही महाज़े जंग को सर कर लिया
शान है बेशीर में सब हैदर ए कर्रार की

मुस्कराहट ने अली असग़र की साबित कर दिया
हैसियत कुछ भी नहीं है हुरमुला के वार की

बच्चा बच्चा कर रहा है ज़िक्रे हैदर देखिये
ये ज़मानत है ज़बान-ए-मीसम-ए-तम्मार की

सुनके हैदर के फ़ज़ाइल तिलमिलाना देखिये
बुघ़्ज़-ए-हैदर ने ही जिनकी ज़िन्दगी दुश्वार की

मर के हर एक मुनकिर ए हैदर को ये अफ़सोस है
बुग़ज़े हैदर में गुज़ारी ज़िन्दगी बेकार की

मर्ग पर मेरे खुली रह जाएँ तो मत ढाँपना
मुन्तज़िर हैं ये निगाहें आखरी सरकार की

मदह ख्वानी शह का मातम, जज़्बा ए नुसरत ज़ुहैर
शीर ए मादर ने हर एक खूबी मेरी बेदार की

Daste Shabbeer pe maidan ko chala hai besheer

सिर्फ छह माह में तू कितना बड़ा है बेशीर
सर उठाए ये फलक देख रहा है बेशीर

खूब मालूम है झूला भी वो अजदर भी इसे
हुरमुला खौफ से यूँ काँप रहा है बेशीर

ए ज़मीं आसमां बस क़ल्ब पे काबू रखना
दस्ते शब्बीर पे मैदां को चला है बेशीर

लड़ने आता तो क़यामत सरे मैदान आती
मुस्कुरा कर ही अभी देख रहा है बेशीर

लाश बैयत की गिरी रन में जो आशूर के दिन
रो दिया लश्करे कुफ्फार हसा है बेशीर

कमसिनी मैं भी शरीअत के मुहाफ़िज़ हो तुम
तुम हसे हो तो ये इस्लाम बचा है बेशीर

शान में उसको ये गुलदस्ता बना लाया ज़ुहैर
तेरी मिदहत में जो कुछ इसने लिखा है बेशीर