खौफ-ए-सूली ना था कुछ दिल में क़ज़ा की हैबत
बोले मीसम के सना मिस्ले इबादत करना
जान जाती है अगर जाए मज़ा आ जाए
ए ज़बां पंजतन-ए-पाक की मिदहत करना
खौफ-ए-सूली ना था कुछ दिल में क़ज़ा की हैबत
बोले मीसम के सना मिस्ले इबादत करना
जान जाती है अगर जाए मज़ा आ जाए
ए ज़बां पंजतन-ए-पाक की मिदहत करना
अब कैसे भला होगी मिदहत अली असग़र की
जब फूल चुरा लाए कुदरत अली असग़र की
मुस्कान खुदा तूने फूलों को अता कर दी
बस मेरी ज़बाँ पर हो मिदहत अली असग़र की
शब्बीर सर-ए-मैदाँ बेशीर यूँ लाए हैं
दुनिया को दिखानी थी क़ुदरत अली असग़र की
तलवार नहीं फिर भी असग़र का हुनर देखो
नौ लाख पे छाई है हैबत अली असग़र की
छह माह के सिन में ही ज़ालिम को रुला डाला
क्या होती जवाँ होकर ताक़त अली असग़र की
जब नाम-ए-अली असग़र मैं लब पे सजाता हूँ
साँसों से भी आती है निकहत अली असग़र की
लरज़े में ज़मीं रहती ये ताब ना ला पाती
तनहा जो अगर होती तुरबत अली असग़र की
वो कौन सा बचपन है जो सदियों पे भारी है
छह माह का सिन शह की नुसरत अली असग़र की
वो शक्ल क़सीदे की लेती है ज़ुहैर अक्सर
लबरेज़ हुई जब भी उल्फत अली असग़र की
پھولوں نے مسکرا کے یہ پیغام دیا ہے
دسویں رجب ہے آمد فرزندے رضا ہے
دلہن زمیں بنی ہے مسرّت کی فضا ہے
مولا تقی کا آمدے پرنور ہوا ہے
ابتر جو کہ رہا تھا زمانہ و دیکھ لے
گلشن میں امامت کے نواں پھول کھلا ہے
رحمت ہے فضیلت ہے یہ خالق کی اتا ہے
یہ جشنے ولا ہمکو سعادت سے ملا ہے
جبریل دے رہے ہیں صدا آسمان سے
گھر میں رضا کے آج نیا پھول کھلا ہے
تقوا ہے امامت ہے شجاعت ہے سخاوت
جس رخ سے انہیں دیکھئے تصویرے رضا ہے
بچپن میں بتایا ہے سنو ہم نہیں ڈرتے
اس طرح بھی مامون کو مغلوب کیا ہے
ماتم کبھی شبّیر کا کم ہو نہیں سکتا
دیتا ہے سکوں دل کو فقط اتنا پتا ہے
پردہ رہے ہر قوم کی بیٹی کا سلامت
اس جشنے مسرّت میں یہ خالق سے دعا ہے
اوصافے تقی تمسے ادا ہو سکیں ظہیر
اس جشنے مسرّت میں یہ خالق سے دعا ہے