शबीह-ए-मुस्तफ़ा का ये निराला वार मिलता है
सितम का सारा लश्कर सरहदों से पार मिलता है
बहत्तर कोशिशे कर ली बहत्तर बार हारा है
सितम हैरान है हर बार ही इंकार मिलता है
अली वाले का दुनिया में ये ही किरदार मिलता है
नई मिदहत सुनाता है उसे जब दार मिलता है
भले सूली चढ़ाए या हमारी जान ही ले ले
क़लम कर दे ज़बाँ फिर भी, उसे इंकार मिलता है
वो असग़र हों या अकबर हों या फिर इब्ने मज़ाहिर हों
अलग हर सिन में नुसरत का वही मेयार मिलता है
अगर साया ना होता तो मुकम्मल मुस्तफा होते
अली अकबर में हुस्ने अहमद ए मुख़्तार मिलता है
अज़ान ए सुबह ए आशूरा ये कहती ज़ुहैर हमसे
शऊर ए हक़ जो रखता है वो ही बेदार मिलता है