Kaunsa Husn Shah Ke Lal Main Hai

ज़ालिम ए वक़्त किस ख़याल में है
ज़ुल्म तो खुद बा खुद ज़वाल में है

आने वाला है दौर हैदर का
शैख़ अब तक इसी मलाल में है

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चाँद-सूरज में नूर किसका है
किसका जल्वा हर इक जमाल में है

हुस्न ए यूसुफ ये देखता होगा
कौनसा हुस्न शह के लाल में है

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उसकी हिम्मत का हाल क्या कहिए
भागना जिसकी हर मिसाल में है

एक बुढ्ढे का ग़ार में रोना
पूरा क़िस्सा इसी मिसाल में है

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जितने आये थे सब हैं सकते में
शेरे नर है जो बस जलाल में है

एक खत ही तो पार करना है
इतनी हिम्मत किसी के लाल में है

Ali Akbar Main Husn-e-Ahmad-e-Mukhtaar Milta Hai

शबीह-ए-मुस्तफ़ा का ये निराला वार मिलता है
सितम का सारा लश्कर सरहदों से पार मिलता है

बहत्तर कोशिशे कर ली बहत्तर बार हारा है
सितम हैरान है हर बार ही इंकार मिलता है

अली वाले का दुनिया में ये ही किरदार मिलता है
नई मिदहत सुनाता है उसे जब दार मिलता है

भले सूली चढ़ाए या हमारी जान ही ले ले
क़लम कर दे ज़बाँ फिर भी, उसे इंकार मिलता है

वो असग़र हों या अकबर हों या फिर इब्ने मज़ाहिर हों
अलग हर सिन में नुसरत का वही मेयार मिलता है

अगर साया ना होता तो मुकम्मल मुस्तफा होते
अली अकबर में हुस्ने अहमद ए मुख़्तार मिलता है

अज़ान ए सुबह ए आशूरा ये कहती ज़ुहैर हमसे
शऊर ए हक़ जो रखता है वो ही बेदार मिलता है

Akbar Tumhare Husn Pa Yusuf Nisaar Hain

इनकी अताएँ मुझ पा बड़ी बेशुमार हैं
फ़ेहरिस्त में ग़ुलामों की अपने शुमार हैं

या रब अता हो ताकते परवाज़ फ़िक्र को
अकबर की मदह सुनने को सब बे क़रार हैं

पोते हो तुम अली के शबीहे रसूल हो
अकबर तुम्हारे हुसन पा युसुफ निसार हैं

पाया है वो घराना जहाँ आते हैं मलक
अकबर तुम्हारे घर में सभी शाहकार हैं

आशूर को जो तुमने अज़ाने सुबह कही
दीने खुदा में आज भी उसकी बहार हैं