Yun to Jalva Dekhte hain, Roo ba Roo Dekha Nahi

ज़िक्र-ए-अहले बैत जिनको एक नज़र भाता नहीं
नूर-ए-हक़ का उन अंधेरों से कोई रिश्ता नहीं

डर तुझे किस बात का है क्यों भला कहता नहीं
तू फ़ज़ाइल मुर्तज़ा के खोल कर पढता नहीं

अपनी मर्ज़ी बेच दी ख़ालिक़ ने सोने के एवज़
और मर्ज़ी मोल लेकर भी अली मौला नहीं

गर ना होती मर्ज़ी ए रब मुर्तज़ा के हाथ में
फिर नुसैरी भी अली को यूँ खुदा कहता नहीं

गर अली दिल में समां जाए तो ये देखा गया
दार से मदह-ओ-सना करके बशर मरता नहीं

बे विला तो जो भी हो वो हर अमल बेकार है
हज कहाँ फिर हज रहा उमरा भी तो उमरा नहीं

परदे-ए-ग़ैबत से भी वो नूर-ए-हक़ ज़ौ-बार है
यूँ तो जलवे देखते हैं, रूबरू देखा नहीं

खून ए हैदर दिख रहा है आज तक मेहराब में
मस्जिदों में बम धमाके आज का मसला नहीं

ये ख़बर दे दो यज़ीदान-ए-जहाँ को भी ज़ुहैर
बम धमाकों से भी अपना हौसला झुकता नहीं