Kaunsa Husn Shah Ke Lal Main Hai

ज़ालिम ए वक़्त किस ख़याल में है
ज़ुल्म तो खुद बा खुद ज़वाल में है

आने वाला है दौर हैदर का
शैख़ अब तक इसी मलाल में है

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चाँद-सूरज में नूर किसका है
किसका जल्वा हर इक जमाल में है

हुस्न ए यूसुफ ये देखता होगा
कौनसा हुस्न शह के लाल में है

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उसकी हिम्मत का हाल क्या कहिए
भागना जिसकी हर मिसाल में है

एक बुढ्ढे का ग़ार में रोना
पूरा क़िस्सा इसी मिसाल में है

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जितने आये थे सब हैं सकते में
शेरे नर है जो बस जलाल में है

एक खत ही तो पार करना है
इतनी हिम्मत किसी के लाल में है

Sar Ko Peeto Momino Ye Kya Qayamat Ho Gayi

सर को पीटो मोमिनों ये क्या क़यामत हो गई
आज बिन्ते मुस्तफा भी सबसे रुख्सत हो गई

ज़ालिमों ने ये ना सोचा है नबी की लाड़ली
ज़ुल्म वो ढाए के बीबी की शहादत हो गई

हक़ भी छीना, घर जलाया, कलमा-गो कैसे थे वो
सय्यदा के वास्ते क्या क्या मुसीबत हो गई

पिस गयी बेटी नबी की जब दर-ओ-दीवार में
आमद-ए-मोहसिन जो थी वो एक हसरत हो गई

साँस लेना भी था मुश्किल पसलियों के दर्द से
ग़म ज़दा बीबी जहाँ से हाए रुखसत हो गई

कह के ये रोए अली जब देखीं टूटी पसलियां
क्या कहूंगा मैं नबी से, क्या अमानत हो गई

सिर्फ अठारह बरस में हो गई बीबी ज़ईफ़
कितनी सदियों के बराबर एक साअत हो गई

क़ब्र में भी चैन से सोने ना पाई सय्यदा
मुन्हदिम बिन्ते नबी की हाए तुर्बत हो गई

बैन करती थी नबी से लाड़ली बेटी ज़ुहैर
आप के जाते ही बाबा एक क़यामत हो गई

Izzat Mili Hussain ko Har Khaas-o-Aam Main

थी जितनी खूबियाँ भी रसूले अनाम में
उन सबको रब ने रख दिया बारा इमाम में

पहले वज़ू किया है हमारे खयाल ने
तब नाम ए मुस्तफा को लिखा है कलाम में

खुद सा बता रहे हो नबी को जो शेख जी
लम्बे फसोगे रख लो ज़बां को लग़ाम में

मुनकिर इमामतों का भी जन्नत में जायेगा
ऐसा तो कुछ नहीं है इलाही निज़ाम में

है ज़िक्र ए अहले बैत ही हर जा खुदा के साथ
सजदे में भी रुकू में क़ुनूत ओ सलाम में

उम्मे अबीहा जिसको समझना मुहाल हो
ये देख ले खड़े हैं नबी ऐहतराम में

हारिस पे गिर के अर्श से पत्थर ने ये कहा
शक हो गया था इसको खुदा के कलाम में

ए हुर ये मोज़ेज़ा है इमाम ए हुसैन का
आता है तेरा नाम अलयहिस्सलाम में

कार्बोबला से हट के सफर हो तो लाईए
हज का सवाब हो जहाँ हर एक गाम में


रोज़ा नमाज़ करके भी कुछ फायदा नहीं
जब तक समझ नहीं है हलाल-ओ-हराम में

जिसने नबी की बेटी के घर को जला दिया
वो भी ख़लीफ़ा हो गया देखो अवाम में


ज़ैनब ने अपने ख़ुत्बे से सबको बता दिया
इज़्ज़त मिली हुसैन को हर ख़ास-ओ-आम में

क़ैदी समझ रहा है, तेरी भूल है यज़ीद
मैं शाम करने आई हूँ दरबार-ए-शाम में

Hamari Rooh Ke Andar Hussain Rehta Hai

अगर ये पूछो कहाँ पर हुसैन रहता है
हमारी रूह के अंदर हुसैन रहता है

हमारी आँखों में कर्बोबला के मंज़र हैं
दिलों में सिब्ते पयम्बर हुसैन रहता है

घरों में अपने ख़ुशी हो या कोई ग़म हो कभी
शऊर ओ फ़िक्र का मसदर हुसैन रहता है

खुदा को सजदा नबी का था एक ऐसा भी
के जिसमें फ़िक्र का महवर हुसैन रहता है

सहाबियों ने वो सजदा तो खूब देखा है
नबी की पुश्त के ऊपर हुसैन रहता है

ज़माने भर ने शहादत के बाद देख लिया
कटा के सर भी सुखनवर हुसैन रहता है

यज़ीदियत तो ज़माने से मिट गयी कब की
जहाँ में आज भी घर घर हुसैन रहता है

ये कर्बला है यहाँ तख्तो ताज झुकते हैं
यहाँ पे दीन का रहबर हुसैन रहता है

तमाम रात यही सोच कर कटी हुर की
कि जाए कैसे जहाँ पर हुसैन रहता है

यही बताने को हुर छोड़ कर इधर आया
कहाँ है ज़ुल्म, कहाँ पर हुसैन रहता है

ज़ुहैर पूछे कोई तो उसे बता देना
हमारी रूह के अंदर हुसैन रहता है

Gham-e-Hussain Main Ashkon ki Zindagi Kya Hai

ग़म-ए-हुसैन में अश्कों की ज़िंदगी क्या है
बता रहे हैं ज़माने को बंदगी क्या है

ग़मे हुसैन मिला है खुदा का शुक्र करो
बताओ नस्लों को ज़ेहरा की नौकरी क्या है

जो हक़ है मातम-ए-सरवरؑ का वो बताते रहो
ज़माना इतना बुरा है कि दो घड़ी क्या है

हुसैनؑ नाम है जिसका, नबी का लाल है वो
बग़ैर-ए-इश्क़-ए-शाह-ए-दीन, तो आदमी क्या है

जो कर्बला में इकहत्तर हुसैन वाले थे
बता गए वो ज़माने को बंदगी क्या है

अली के लाल ने नेज़े पे भी नमाज़ पढ़ी
अब और कैसे बताऊँ तुम्हें वली क्या है

चले जो झूले से असग़र खते क़दम ना दिया
ज़माना ढूंढने निकला के पैरवी क्या है

हुसैन ही तो फ़क़त दीन के मुहाफ़िज़ हैं
न हो हुसैन तो ये दीन, दीन ही क्या है

ज़ुहैरؔ लब पे रहे बस यही दुआ हर दम
हुसैनؑ इश्क़ है, इस इश्क़ की कमी क्या है

Har Saans Tera Zikr Sare Daar Kare Hai

दिल अश्क़ो से कुछ इस तरह यलग़ार करे है
हर ज़ुल्म के हमले को ही बेकार करे है

है कौन मुजाहिद भी हो और सीना सिपर भी
डरता ही ना हो वार पे बस वार करे है

मीसम की तरह कौन है जो कर के दिखाए
हर साँस तेरा ज़िक्र सरे दार करे है

ज़ुल्मत को मिटाने के लिए जान दी हमने
है कोई जो इस बात से इंकार करे है

इस्लाम का चेहरा उसे हरगिज़ ना समझना
जो खाना ए काबा से भी व्यापार करे है

क्यों कर तुम्हें मंज़ूर हुई ऐसी क़यादत
करती है अमल वो के जो बद कार करे है

ये कह दो ज़ुहैर अब भी ज़माने से सुधर जाए
क्यों अपनी इबादत को यूँ मिस्मार करे है


है कोई जो इस बात से इंकार करे है
अब्बास भी हैदर की तरह वार करे है

सिफ़्फ़ीन में अब्बास ने ये कर के दिखाया
ये एक के दो और दो हों तो फिर चार करे है

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हैदर से अदावत तुझे बेकार करे है
क्यों अपने ही पैरों पे तू खुद वार करे है

रखता ही नहीं उल्फ़ते हैदर तू ज़रा सी
और कहता है सरकार से तू प्यार करे है

क्या हक़ है बराबर में दफ़न होने का उसको
हमराह जो गर ग़ार में हो ज़ार करे है

क्यों नारा ए हैदर से अदावत है बता फिर
क्या क़ातिल ए ज़ेहरा से भी तू प्यार करे है

जो ख़ुद को नबी जैसा बताने पे तुला है
गोया कि नबूअत का भी इंकार करे है

दम नादे अली करती है जब शीर पिलाए
माँ गोदी में तैयार अज़ादार करे है

इस वास्ते भी नादे अली माँ ने सिखाई
मजधार में कश्ती को अली पार करे है

तुम देखना जन्नत में ज़ुहैर आएगा वो ही
जो इनके दुशमनों पे बे शूमार करे है

Madar-e-Fatima Khadija Hain

क्या कहूं तुमसे क्या खदीजा हैं
नूर-ए-राह-ए-हुदा खदीजा हैं

हम सर ए मुस्तफा खदीजा हैं
मादर ए फातिमा खदीजा हैं

दीन मोहसिन है मोमिनो सच है
दीन की मोह सिना खदीजा हैं

मालो दौलत लुटाई है दीं पर
अस्ल-ए-ख़ैर-ओ-अता ख़दीजा हैं

माल ही क्या, थी जान भी हाज़िर
अज़्म की इंतिहा ख़दीजा हैं

थी जो मूनिस नबी की हर लम्हा
नूर ए सब्र ओ रज़ा खदीजा हैं

इंतिहा ये ज़ुहैर अज़मत की
पहली जो मोमिना, खदीजा हैं

Yun to Jalva Dekhte hain, Roo ba Roo Dekha Nahi

ज़िक्र-ए-अहले बैत जिनको एक नज़र भाता नहीं
नूर-ए-हक़ का उन अंधेरों से कोई रिश्ता नहीं

डर तुझे किस बात का है क्यों भला कहता नहीं
तू फ़ज़ाइल मुर्तज़ा के खोल कर पढता नहीं

अपनी मर्ज़ी बेच दी ख़ालिक़ ने सोने के एवज़
और मर्ज़ी मोल लेकर भी अली मौला नहीं

गर ना होती मर्ज़ी ए रब मुर्तज़ा के हाथ में
फिर नुसैरी भी अली को यूँ खुदा कहता नहीं

गर अली दिल में समां जाए तो ये देखा गया
दार से मदह-ओ-सना करके बशर मरता नहीं

बे विला तो जो भी हो वो हर अमल बेकार है
हज कहाँ फिर हज रहा उमरा भी तो उमरा नहीं

परदे-ए-ग़ैबत से भी वो नूर-ए-हक़ ज़ौ-बार है
यूँ तो जलवे देखते हैं, रूबरू देखा नहीं

खून ए हैदर दिख रहा है आज तक मेहराब में
मस्जिदों में बम धमाके आज का मसला नहीं

ये ख़बर दे दो यज़ीदान-ए-जहाँ को भी ज़ुहैर
बम धमाकों से भी अपना हौसला झुकता नहीं