Charag Leke Kahan Samne Hawa ke Chale

खुदा का दीन हमें मुस्तफा सिखा के चले
हैं मेरे बाद अली सबको ये बता के चले

अली के बाद हसन और हसन के बाद हुसैन
गला कटा के जो दीने खुदा बचा के चले

ए कर्बला हो मुबारक तुझे नसीब तेरा
लहू से अपने बहत्तर तुझे सजा के चले

ज़माना जान ले मरते नहीं शहीद कभी
कलामे पाक को नेज़ों से हम सुना के चले

ये फ़ौज क्या है ज़मी आसमा उलट दूँगा
सग़ीर झूले से ये कह के मुस्कुरा के चले

झुका ना पाए थे सर तो हुसैन का लेकिन
यज़ीद वाले सिना पर उसे उठा के चले

ज़ईफ़ होके भी नुसरत में शाहे दीं की हबीब
है दोस्ती का जो मेयार वो दिखा के चले

सवाले बैयते फ़ासिक़ पा ये अजल ने कहा
चराग़ लेके कहाँ सामने हवा के चले

ज़ुहैर बैअते फ़ासिक़ के घर अँधेरे हैं
हुसैन जबसे चराग़ों की लौ बुझा के चले

Sakina Aapki Midhat Main Sare Hazir Hain

क़ुरआने इश्क़ो मवद्दत में जितने गोहर हैं
सकीना आपकी मिदहत को सारे हाज़िर हैं

जहान भर में जहाँ आयतें उतरती हैं
उसी घराने के दिलबर की आप दुख्तर हैं

रसूले पाक के दिलबर तुम्हारे बाबा हैं
रबाब माँ हैं तेरी भाई नन्हें असग़र हैं

हसन हुसैन नबी फातिमा अली मौला
जहान भर में ये ही पांच सबसे बेहतर हैं

इमाम बारा हैं मासूम हैं फ़क़त चौदा
शहीदे करबो बला कुल के कुल बहत्तर हैं

सजा है दीने खुदा बे बहा नगीनों से
चमक रहे हैं जो इसमें वो कुल बहत्तर हैं

ज़िया में सारे बहत्तर ही सबसे आला हैं
मगर सग़ीर शहे दीं के सबसे अकबर हैं

जलाया जिसने मुसल्ला इमाम का मेरे
उसी की आल के काँधे पे आज बिस्तर हैं

ज़ुहैर हमको ज़माना मिटा नहीं सकता
नबी को हक़ ने जो बक्शा है हम वो कौसर हैं

Akbar Tumhare Husn Pa Yusuf Nisaar Hain

इनकी अताएँ मुझ पा बड़ी बेशुमार हैं
फ़ेहरिस्त में ग़ुलामों की अपने शुमार हैं

या रब अता हो ताकते परवाज़ फ़िक्र को
अकबर की मदह सुनने को सब बे क़रार हैं

पोते हो तुम अली के शबीहे रसूल हो
अकबर तुम्हारे हुसन पा युसुफ निसार हैं

पाया है वो घराना जहाँ आते हैं मलक
अकबर तुम्हारे घर में सभी शाहकार हैं

आशूर को जो तुमने अज़ाने सुबह कही
दीने खुदा में आज भी उसकी बहार हैं

Khuli jo Aankh to Phele Khuda ka Ghar Dekha

ज़माना झूम रहा था जहाँ जिधर देखा
खुदा के घर में जो इमरान का पिसर देखा

रजब की तेरा को बिन्ते असद ने काबे में
अली के इश्क़ में बनते हुआ वो दर देखा

जिदार टूट रही थी खड़ी थी बिन्ते असद
ज़माने भर की किसी माँ का ये जिगर देखा

बुतों की भीड़ थी काबे में जब अली आये
ना कुछ सुनाया अली ने ना एक नज़र देखा

वसी को अपने जो लेने को मुस्तफा आये
जो खोली आँख रुखे सय्यदुल बशर देखा

जब एक जा मिले शम्सो कमर तो काबे में
ज़माने भर के खुदा थे तितर बितर देखा

उन्हीं खुदाओं की अब तक भी याद दिल में लिए
नमाज़ में भी किसी ने इधर उधर देखा

सुबह हुई तो अली थे नबी नहीं थे वहां
मुनाफिकों ने वो बिस्तर तो रात भर देखा

नबी की क़ब्र को जिस जिस ने घेर रख्खा है
उसी की आल को दुनिया में दर बदर देखा

Aaj Lazim Hai Ke Deewaar Main Dar Ho Jaye

ए खुदा जिस पा तेरी ख़ास नज़र हो जाए
संग रेज़े से वो नायाब गोहर हो जाए

आयी जो तेरा रजब हस के ये काबे ने कहा
आज लाज़िम है के दीवार मैं दर हो जाये

रास्ता हक़ को बताएगी दुआ अहमद की
हो अली जिस भी तरफ हक़ भी उधर हो जाए

जबके ईमान हलाकत के सबब लाया हो
क्या हो वो शख्स खलीफा भी अगर हो जाए

ग़ैर मुमकिन है अज़ाबों में कमी आएगी
जा के फिर दफ़्न भले चाहे जिधर हो जाए

दार से मीसमे तम्मार सदा देने लगे
ये ज़बां क्या है फ़िदा जानो जिगर हो जाए

मन्क़बत ऐसी हो मौला को पसंद आए ज़ुहैर
मेरे अलफ़ाज़ में बस इतना असर हो जाए

Daste Shabbeer pe maidan ko chala hai besheer

सिर्फ छह माह में तू कितना बड़ा है बेशीर
सर उठाए ये फलक देख रहा है बेशीर

खूब मालूम है झूला भी वो अजदर भी इसे
हुरमुला खौफ से यूँ काँप रहा है बेशीर

ए ज़मीं आसमां बस क़ल्ब पे काबू रखना
दस्ते शब्बीर पे मैदां को चला है बेशीर

लड़ने आता तो क़यामत सरे मैदान आती
मुस्कुरा कर ही अभी देख रहा है बेशीर

लाश बैयत की गिरी रन में जो आशूर के दिन
रो दिया लश्करे कुफ्फार हसा है बेशीर

कमसिनी मैं भी शरीअत के मुहाफ़िज़ हो तुम
तुम हसे हो तो ये इस्लाम बचा है बेशीर

शान में उसको ये गुलदस्ता बना लाया ज़ुहैर
तेरी मिदहत में जो कुछ इसने लिखा है बेशीर

Khuda ke ghar se Ali ke dar se…

ہماری نسلوں میں ہے محبّت خدا کے گھر سے علی کے در سے
ہمیں ملی ہے جہاں میں فرحت خدا کے گھر سے علی کے در سے

ہم ہی نے پاے رسول اکرم ہم ہی کو بارہ ملے ہیں رہبر
اذان جیسے ہے پھر اقامت خدا کے گھر سے علی کے در سے

ہے خوش نصیبی جو ہم نے پائی غدیر خم اور عزا سرور
ہےایک نعمت تو ایک عبادت خدا کے گھر سے علی در سے

ہوئی ہے صدیاں مٹا نا پاے ابھی تلک بھی نشان آمد
ہے شیخ جی کو عجیب دقّت خدا کے گھر سے علی کے در سے

امام حق ایگا یہیں سے علم و لہراۓ گا یہیں پر
اٹھے گا پردہ کھلے گی غیبت خدا کے گھر سے علی کے در سے

یہ بولے میثم زبان میری کٹی تو کوئی بھی غم نہیں ہے
ہوئی ہے لبریز میری چاہت خدا کے گھر سے علی کے در سے

اتر کے تارا بتا رہا ہے نبی سے رشتے کا معملا ہے
فقط بتانی ہے مجھکو نسبت خدا کے گھر سے علی کے در سے

سلام عظمت پا شہزادی تیرے وسیلے کا موجزا ہے
جو مل رہی ہے ہر ایک حاجت خدا کے گھر سے علی کے در سے

عزا شاہ میں لوٹا رہے ہیں پھراور زیادہ بھی پا رہے ہیں
ہے رزق و روزی میں اپنے برکت خدا کے گھر سے علی کے در سے

کسی نے تو حق علی چھینا کسی نے آ کر و در جلایا
ہوئی ہے کس پر بتاؤ لعنت خدا کے گھر سے علی کے در سے

ظہیر مدحت کا معجزہ ہے یہ تری ماں کی دعا یں بھی ہیں
جہاں بھر میں ملی ہے اذّت خدا کے گھر سے علی کے در سے

Keh raha hai KHUDA Ghadeer ke baad

کہ رہا ہے خدا غدیر کے بعد
دین کامل ہوا غدیر کے بعد

ہم کو مولا ملا غدیر کے بعد
دل کسی کا جلا غدیر کے بعد

کیا کہوں کیا ہوا غدیر کے بعد
تھا الگ ماجرا غدیر کے بعد

منھ سے بخ خن جو کھ کے آیا تھا
ہالے نہ ساز تھا غدیر کے بعد

رشک صحرا تھی گھر کی ویرانی
منھ تھا لٹکا ہوا غدیر کے بعد

چشم گریاں تھی چاک تھا دامن
ہولیا بگڑا ہوا غدیر کے بعد

پوچھا بیگم نے کے ہوا کیا ہے
شیخ جی کو بھلا غدیر کے بعد

بولے جھنجھلا کے یہ بڑے صاحب
دل ہے جھلسا ہوا غدیر کے بعد

مرتضیٰ کو نبی کے کہنے پر
میں نے مولا کہا غدیر کے بعد

کب ہوا اور کہاں ہوا یہ سب
بولے بے ساختہ غدیر کے بعد

شیخ جی کا یہ حال ہونا ظہیر
این لازم ہی تھا غدیر کے بعد

Haji Samajh Rahe The Hidayat Ki Baat Hai

صحرا میں دھوپ ہونا تو فطرت کی بات ہے
فطرت کہوں یا یوں کہوں قدرت کی بات ہے

قدرت یہ چاہتی تھی کے خم میں روکیں سبھی
ہر چند حاجیوں پے یہ زحمت کی بات ہے

زحمت بڑھی جو کھ کے کجاوے لئے گئے
خطبہ نبی کا ہوگا فصاحت کی بات ہے

سبکے کجاوے لے کے جو ممبر بنا دیا
حاجی سمجھ رہے تھے ہدایت کی بات ہے

من کنتو کہ رہے تھے علی کو رسول حق
ممبر پے اب علی کی ولایت کی بات ہے

ممبر پا ہیں نبی تو ہیں ہاتھوں پا مرتضیٰ
ھوٹوں پا بھی نبی کے ولایت کی بات ہے

اعلان کی تپش سے جلے جا رہے تھے لوگ
بغزے علی ولی ہے علامت کی بات ہے

کچھ لوگ تھے کے جن پی تپش کا اثر نہ تھا
علفت کی بات ہے یہ مودّت کی بات ہے

ہم تو علی کو مانے گے جیسا نبی کہیں
یہ اپنے اپنے خون میں طہارت کی بات ہے

اعلان بھول جانا حماقت ہے شیخ جی
بخخن جو کہ کے بھولے ہو حیرت کی بات ہے

لکھو پڑھو سنو بھی سناؤ غدیر خم
تم پر ظہیر انکی عنایت کی بات ہے

Ali Husain o Hasan ko Salam Karna Hai

بصد خلوص بصد احترام کرنا ہے
جوکام قد سے بد ہے و کام کرنا ہے

جھکاے سر کو پے فاطمہ رسول ضمن
علی حسین حسن کو سلام کرنا ہے


قلم کی نوک سے یہ بھی تو کام کرنا ہے
فقیر شام کا جینا حرام کرنا ہے

بچا کے فرش عزا یہ بتا گییں زینب
حسین آپکے مقصد کو عام کرنا ہے

کرینگے قتل زہرا پی لعنت جام کر
حرام زادوں کا جینا حرام کرنا ہے