Roi Abbas Ko De De Ke Duhai Zainab

दश्त में ख़ाक-ए-सितम ओढ़ के आई ज़ैनब
रोई अब्बास को दे-दे के दुहाई ज़ैनब

भा गयी कैसे तराई मेरे भाई तुमको
क्या सकीना की ज़रा याद ना आई तुमको
क्यों नहीं सुनते हो, देती है दुहाई ज़ैनब
रोई अब्बास को दे-दे के दुहाई ज़ैनब

जब से दरिया पा गए हो ना पलट कर आए
पानी आए या ना आए मेरा भाई आए
अब कहाँ ढूंढेगी तुझको मेरे भाई, ज़ैनब
रोई अब्बास को दे-दे के दुहाई ज़ैनब

मैंने देखा है सर-ए-शाह-ए-हुदा कटते हुए
चादरें छिनते हुए हाय हरम लुटते हुए
किस तरह भूल सकेगी ये तबाही ज़ैनब
रोई अब्बास को दे-दे के दुहाई ज़ैनब

जलते खेमों से इमामत को बचाया मैंने
उजड़े कुनबे को हर एक गाम संभाला मैंने
ढूंढने बन में सकीना को भी आई ज़ैनब
रोई अब्बास को दे-दे के दुहाई ज़ैनब

हौसला देती थी सबको मैं नहीं रोती थी
जब बंधे हाथ तो बस तुमको सदा देती थी,
बे कफ़न लाश थी कुछ कर भी ना पाई ज़ैनब
रोई अब्बास को दे-दे के दुहाई ज़ैनब

हाय हर मोड़ पे एक ताज़ा मुसीबत आई
बे रिदा हमको फिराया गया दर दर भाई
फिर भी शिकवा कोई लब पर नहीं लाई ज़ैनब
रोई अब्बास को दे-दे के दुहाई ज़ैनब