थी जितनी खूबियाँ भी रसूले अनाम में
उन सबको रब ने रख दिया बारा इमाम में
पहले वज़ू किया है हमारे खयाल ने
तब नाम ए मुस्तफा को लिखा है कलाम में
खुद सा बता रहे हो नबी को जो शेख जी
लम्बे फसोगे रख लो ज़बां को लग़ाम में
मुनकिर इमामतों का भी जन्नत में जायेगा
ऐसा तो कुछ नहीं है इलाही निज़ाम में
है ज़िक्र ए अहले बैत ही हर जा खुदा के साथ
सजदे में भी रुकू में क़ुनूत ओ सलाम में
उम्मे अबीहा जिसको समझना मुहाल हो
ये देख ले खड़े हैं नबी ऐहतराम में
हारिस पे गिर के अर्श से पत्थर ने ये कहा
शक हो गया था इसको खुदा के कलाम में
ए हुर ये मोज़ेज़ा है इमाम ए हुसैन का
आता है तेरा नाम अलयहिस्सलाम में
कार्बोबला से हट के सफर हो तो लाईए
हज का सवाब हो जहाँ हर एक गाम में
रोज़ा नमाज़ करके भी कुछ फायदा नहीं
जब तक समझ नहीं है हलाल-ओ-हराम में
जिसने नबी की बेटी के घर को जला दिया
वो भी ख़लीफ़ा हो गया देखो अवाम में
ज़ैनब ने अपने ख़ुत्बे से सबको बता दिया
इज़्ज़त मिली हुसैन को हर ख़ास-ओ-आम में
क़ैदी समझ रहा है, तेरी भूल है यज़ीद
मैं शाम करने आई हूँ दरबार-ए-शाम में