Izzat Mili Hussain ko Har Khaas-o-Aam Main

थी जितनी खूबियाँ भी रसूले अनाम में
उन सबको रब ने रख दिया बारा इमाम में

पहले वज़ू किया है हमारे खयाल ने
तब नाम ए मुस्तफा को लिखा है कलाम में

खुद सा बता रहे हो नबी को जो शेख जी
लम्बे फसोगे रख लो ज़बां को लग़ाम में

मुनकिर इमामतों का भी जन्नत में जायेगा
ऐसा तो कुछ नहीं है इलाही निज़ाम में

है ज़िक्र ए अहले बैत ही हर जा खुदा के साथ
सजदे में भी रुकू में क़ुनूत ओ सलाम में

उम्मे अबीहा जिसको समझना मुहाल हो
ये देख ले खड़े हैं नबी ऐहतराम में

हारिस पे गिर के अर्श से पत्थर ने ये कहा
शक हो गया था इसको खुदा के कलाम में

ए हुर ये मोज़ेज़ा है इमाम ए हुसैन का
आता है तेरा नाम अलयहिस्सलाम में

कार्बोबला से हट के सफर हो तो लाईए
हज का सवाब हो जहाँ हर एक गाम में


रोज़ा नमाज़ करके भी कुछ फायदा नहीं
जब तक समझ नहीं है हलाल-ओ-हराम में

जिसने नबी की बेटी के घर को जला दिया
वो भी ख़लीफ़ा हो गया देखो अवाम में


ज़ैनब ने अपने ख़ुत्बे से सबको बता दिया
इज़्ज़त मिली हुसैन को हर ख़ास-ओ-आम में

क़ैदी समझ रहा है, तेरी भूल है यज़ीद
मैं शाम करने आई हूँ दरबार-ए-शाम में

Hamari Rooh Ke Andar Hussain Rehta Hai

अगर ये पूछो कहाँ पर हुसैन रहता है
हमारी रूह के अंदर हुसैन रहता है

हमारी आँखों में कर्बोबला के मंज़र हैं
दिलों में सिब्ते पयम्बर हुसैन रहता है

घरों में अपने ख़ुशी हो या कोई ग़म हो कभी
शऊर ओ फ़िक्र का मसदर हुसैन रहता है

खुदा को सजदा नबी का था एक ऐसा भी
के जिसमें फ़िक्र का महवर हुसैन रहता है

सहाबियों ने वो सजदा तो खूब देखा है
नबी की पुश्त के ऊपर हुसैन रहता है

ज़माने भर ने शहादत के बाद देख लिया
कटा के सर भी सुखनवर हुसैन रहता है

यज़ीदियत तो ज़माने से मिट गयी कब की
जहाँ में आज भी घर घर हुसैन रहता है

ये कर्बला है यहाँ तख्तो ताज झुकते हैं
यहाँ पे दीन का रहबर हुसैन रहता है

तमाम रात यही सोच कर कटी हुर की
कि जाए कैसे जहाँ पर हुसैन रहता है

यही बताने को हुर छोड़ कर इधर आया
कहाँ है ज़ुल्म, कहाँ पर हुसैन रहता है

ज़ुहैर पूछे कोई तो उसे बता देना
हमारी रूह के अंदर हुसैन रहता है

Jisne Dare Hussain Pa Sar Ko Jhuka Liya

हुर की तरह नसीब को अपने जगा लिया
जिसने दरे हुसैन पा सर को झुका लिया

हमने जो शह का फ़र्शे मसर्रत बिछा लिया
हर एक यज़ीद ज़ादे ने मुँह को छुपा लिया

बे रोक टोक सीधा जहन्नम में जायेगा
जो रास्ता हुसैन से हट कर बना लिया

आग़ोश ए फातिमा में हैं शब्बीर इस तरह
इस्मत ने जैसे गोद में क़ुरआन उठा लिया

फितरुस को बालो पर भी मिले ज़िन्दगी मिली
झूले से उसने ख़ुद को ज़रा-सा मिला लिया

ज़ालिम की पूरी फ़ौज ही सकते में आ गयी
रन में ज़रा सग़ीर यूँ ही मुस्कुरा लिया

मुस्कान से ही फ़ौज में सब खलबली सी है
क्या होगा गर सग़ीर ने नेज़ा उठा लिया

जाऊं ना में पलट के यही आरज़ू रही
इक बार जिसने रोज़े का दीदार पा लिया

मंज़र जो कर्बला के मयस्सर हुए हमें
नज़रों के रास्ते उन्हें दिल में बसा लिया

नज़रों से अपनी रोका था लश्कर दिलेर ने
तुमसे हटेंगे खेमें भला सोच क्या लिया

इस पार आ गया तो वो उस पार जायेगा
जिसने भी एक क़दम मेरे खत से बढ़ा लिया

हम पर ज़ुहैर फातिमा ज़ेहरा की है अता
हमने तो अपना अश्क भी मोती बना लिया