अली को लाना है अपने घर में
खुदा का भी एहतिराम क्या है
जो दर नहीं तो दिवार हँस कर
बताएगी के इमाम क्या है
अली को लाना है अपने घर में
खुदा का भी एहतिराम क्या है
जो दर नहीं तो दिवार हँस कर
बताएगी के इमाम क्या है
या अली या अली या अली या अली
या अली या अली या अली या अली
या अली या अली या अली या अली
मेरा मौला अली मेरा आक़ा अली
आसमानो ज़मीं पर हुकूमत तेरी
दिन तेरी रौशनी रात मर्ज़ी तेरी
हर सितारों ने की है तेरी नौकरी
तेर सदक़े में नबियों की मुश्किल टली
या अली या अली या अली या अली
मैंने खैबर से जब पूँछा ये माजरा
जंग में क्या हुआ कुछ बता तो ज़रा
जब ना थे मुर्तज़ा तो लड़ा कौन था
इतने दिन क्यों लगे क्यों फतह ना हुआ
किसको खैबर में अहमद ने आवाज़ दी
या अली या अली या अली या अली
बोला खैबर के अल मुख़्तसर यूँ हुआ
जंगे का सारा नक़्शा था पलटा हुआ
लड़ने मरहब से कोई भी जाता ना था
लड़ने जाता था कोई तो टिकता ना था
एक भी तो ना था सब में कोई जरी
या अली या अली या अली या अली
सूरमा सब बने मात खाते रहे
झंडे जाते रहे डंडे आते रहे
मात खाते रहे मुँह छुपाते रहे
अपनी ना कामियां सब सुनाते रहे
मर्दे मैदाँ तो उनमे ना निकला कोई
या अली या अली या अली या अली
कितने असहाब थे सब बड़े से बड़े
सबसे आगे थे वो जो ससुर भी हुए
लड़ने वो भी गए थे बड़ी शान से
पहुँचे थे शान से पलटे हैरान से
बे ज़ुबाँ को सुनाने लगे जो खरी
या अली या अली या अली या अली
कितने हज़रात का आना जाना हुआ
ख़त्म हर एक का हर बहाना हुआ
दिन गुज़रते रहे एक ज़माना हुआ
पर खुदा ने था कुछ और ठाना हुआ
आए जिब्रील ले कर वहीं पर वही
या अली या अली या अली या अली
बोले अहमद अलम अब मैं दूँगा उसे
गैर ए फर्रार हो जीत हासिल करे
कितने अलक़ाब थे जो नबी ने कहे
एक लक़ब में भी हमसर ना छोटे बड़े
दिन वो ढलने लगा रात होने लगी
या अली या अली या अली या अली
उफ़ अलम की वो चाहत थी असहाब में
नींद सबकी उडी थी अलम के लियें
नींद कैसी खुली आँखों से खाब में
सोचते थे अलम कल मिलेगा हमें
सोचते सोचते ही सुबह हो गयी
या अली या अली या अली या अली
दिन जो निकला अज़ाने सहर जो हुई
तेज़ धड़कन जो थी तेज़ तर हो गयीं
हम को देंगे अलम बस गुमां था यही
जिस से डरते थे आखिर हुआ फिर वही
मुस्तफा ने पढ़ी फिर जो नादे अली
या अली या अली या अली या अली
वो सदा सुन के बे साख्ता आ गए
जंग लड़ने को मुश्किल कुशा आ गए
जबके बीमार थे मुर्तज़ा आ गए
थे मदीने में पेशे नबी आ गए
गर बुलाये नबी क्यों ना आये वसी
या अली या अली या अली या अली
नाम हैदर का जूं ही नबी ने लिया
जाने कितनो का चेहरा ही मुरझा गया
दिल की हर एक तमन्ना का खूं बह गया
जागना रात भर सब अकारत गया
थी अलम की जो चाहत यूँ ही रह गयी
या अली या अली या अली या अली
लड़ने मरहब से तनहा अली जो गए
सीना पत्थर का चीरा अलम के लिए
बोले हिम्मत हो जिसमें वो आके लड़े
जितने असहाब थे देखते रह गए
एक मरहब की दो लाश कैसे हुई
या अली या अली या अली या अली
एक इशारा अली ने जो दर को किया
दर जो चालीस लोगों से हिलता ना था
ए ज़ुहैर उस इशारे का था मोजिज़ा
दर वो दस्ते दरे इल्म पर आ गया
फिर तो माले गनीमत था और फ़ौज थी
या अली या अली या अली या अली
ज़माना झूम रहा था जहाँ जिधर देखा
खुदा के घर में जो इमरान का पिसर देखा
रजब की तेरा को बिन्ते असद ने काबे में
अली के इश्क़ में बनते हुआ वो दर देखा
जिदार टूट रही थी खड़ी थी बिन्ते असद
ज़माने भर की किसी माँ का ये जिगर देखा
बुतों की भीड़ थी काबे में जब अली आये
ना कुछ सुनाया अली ने ना एक नज़र देखा
वसी को अपने जो लेने को मुस्तफा आये
जो खोली आँख रुखे सय्यदुल बशर देखा
जब एक जा मिले शम्सो कमर तो काबे में
ज़माने भर के खुदा थे तितर बितर देखा
उन्हीं खुदाओं की अब तक भी याद दिल में लिए
नमाज़ में भी किसी ने इधर उधर देखा
सुबह हुई तो अली थे नबी नहीं थे वहां
मुनाफिकों ने वो बिस्तर तो रात भर देखा
नबी की क़ब्र को जिस जिस ने घेर रख्खा है
उसी की आल को दुनिया में दर बदर देखा
سجایا ہے سارا جہاں آج پھرعلی کے لیں
فلک سے آ گئے تارے بھی روشنی کے لیں
رجب کی تیرا ہے کعبے میں آ رہے ہیں علی
حرم کی کھل اٹھی دیوار بھی خوشی کے لیں
ثوا حیدر کررارکیا جہاں والوں
حنسی ہے کعبے دیوار بھی کسی کے لیں
سقیفہ والوں تمہیں مرکے بھی نہ چین ملا
مرے تو لیٹے بھی جا کر برابری کے لیں
زمانہ ہمکو مٹا دے یہ غیر ممکن ہے
دعایں مانگی ہیں زہرا نے ماتمی کے لیں
تمام عزتیں اسکا طواف کیوں نہ کریں
ظہیر لفظ سجاے جو دل کشی کے لیں
مولا جہاں دین کے سردارعلی ہیں
والیوں کے ولی صفدر جررار علی ہیں
ہو بدر احد خندق خیبر یا نہروان
جس سے ڈرا ہے ظلم و للکارعلی ہیں
بستر پا یہ لیٹیں تو نبوعت کو بچا لیں
سو جایں تو قدرت کے خریدارعلی ہیں
اک وارمیں دوکرتے ہیں اور دونو برابر
ہو جنگ کا میدان تو فنکارعلی ہیں
بخخن جو کہا تھا اسے کیوں بھول گئے ہو
ایسا نا کرو شیخ جی سردارعلی ہیں
حق مار کے بن بیٹھے ہوامّت کے خلیفہ
بے فاصلہ مسند پا ہوں حقدارعلی ہیں
کہتی ہے تو کہتی رہے دنیا رضیاللہ
بیزارجو زہرا ہیں تو بیزارعلی ہیں
ہمکو نہ ڈرانہ کبھی اے گردش دوران
ہر وقت مدد کرنے کو تییارعلی ہیں
عبّاس نظر آتے ہیں سففین میں حیدر
یا شکل میں عبّاس کی تکرارعلی ہیں
مشل کشا کا روضہ ہے مشل نہیں ظہیر
کس روض بلا لیں تجھے مختارعلی ہیں