ग़म-ए-हुसैन में अश्कों की ज़िंदगी क्या है
बता रहे हैं ज़माने को बंदगी क्या है
ग़मे हुसैन मिला है खुदा का शुक्र करो
बताओ नस्लों को ज़ेहरा की नौकरी क्या है
जो हक़ है मातम-ए-सरवरؑ का वो बताते रहो
ज़माना इतना बुरा है कि दो घड़ी क्या है
हुसैनؑ नाम है जिसका, नबी का लाल है वो
बग़ैर-ए-इश्क़-ए-शाह-ए-दीन, तो आदमी क्या है
जो कर्बला में इकहत्तर हुसैन वाले थे
बता गए वो ज़माने को बंदगी क्या है
अली के लाल ने नेज़े पे भी नमाज़ पढ़ी
अब और कैसे बताऊँ तुम्हें वली क्या है
चले जो झूले से असग़र खते क़दम ना दिया
ज़माना ढूंढने निकला के पैरवी क्या है
हुसैन ही तो फ़क़त दीन के मुहाफ़िज़ हैं
न हो हुसैन तो ये दीन, दीन ही क्या है
ज़ुहैरؔ लब पे रहे बस यही दुआ हर दम
हुसैनؑ इश्क़ है, इस इश्क़ की कमी क्या है