Sila Madh-e-Hasan Ka Paa Rahe Hain

यक़ी जिनको नहीं वो आ रहे हैं
वो ही तो क़ोम को भटका रहे हैं

अज़ानों और अक़ामत पर भी झगडे
तमाशा कोम का बनवा रहे हैं

फ़क़त भूके हैं और प्यासे हैं दिन भर
ये रोज़े क्या हमें सिखला रहे हैं

अना को छोड़ दें आओ सभी हम
हसन भी तो ये ही समझा रहे हैं

सजा है जश्न सिब्ते मुस्तफा का
अली ओ फातिमा खुद आ रहे हैं

मोहम्मद को जो अब्तर कह रहे थे
हसन को देख कर घबरा रहे हैं

ये फन देखो ज़रा सुल्ह ए हसन का
क़लम से सर उड़ाए जा रहे हैं

शऊर ओ अज़्म में इल्मो अमल में
अली वाले सदा आला रहे हैं

हमारे हौसले दुनिया से पूछो
अकेले हो के भी हड़का रहे हैं

यक़ीनी मौत फिर टूटेगी सर पर
अभी तो बस तुम्हें समझा रहे हैं

Hasan Noor-e-Khuda Ki Raushni hai

नबी से इश्क़ ओ उल्फत, आगही है
नबी पर जान देना, ज़िन्दगी है
नबी का हर अमल, रब की वही है
नहीं इनकी नहीं, रब की नहीं है

नबी का जा नशी वाहिद अली है
अली जैसा नहीं कोई नहीं है

अली हर हाल में हक़ का वली है
अली के नाम से मुश्किल टली है
अली ने तो मदद नबियों की की है
अली का ज़िक्र रब की बंदगी है

अली जिसको समझ आता नहीं है
खता ये माँ की है उसकी नहीं है

मेरी माँ ने मुझे ये सीख दी है
नहीं दिल में अली तो तीरगी है
सहारा बे सहारों का अली है
हर एक ग़म की दवा नादे अली है

बशर गिरते हुआ गिरता नहीं है
कहा बेसाख्ता जब या अली है

मदीने में ये ही होता था अक्सर
नबी को लोग कुछ कहते थे अब्तर
ये ताना बार था अहमद के दिल पर
लिए मायूस दिल आये जो घर पर

कहा ख़ालिक़ ने ए जिब्रील जाओ
मेरे मेहबूब को कौसर सुनाओ

लिए जिब्रील कौसर आए दर पर
कहा मायूस ना हों ए पयम्बर
खुदा ने आपको भेजा है कौसर
कहा जिसने रहेगा वो ही अब्तर

नबूअत जो खतम तुम पर करुंगा
तुम्हारे लाल मैं ज़ेहरा को दूँगा

वो ज़ेहरा जो के है उम्मे अबीहा
है सर पर ताज ख़ातूने जिना का
नबी की नस्ल को जिसने चलाया
जहाँ में नाम है दो लाडलों का

इमामत इनके आँगन में पली है
विलायत जिनसे दुनिया को मिली है

हसन जाने अली सिब्ते नबी है
हसन खुद भी वली इब्ने वली है
हसन जैसा किसी का हुस्न भी है
हसन नूर ए खुदा की रौशनी है

मलक इनके ही दर पर आ रहे हैं
लिबास ए खुल्द ये मँगवा रहे हैं

हसन ने सुल्ह कर के दीं बचाया
किया वो वार कुछ भी बच ना पाया
अमीर ए शाम को क़ैदी बनाया
क़लम की नोक से यूँ सर उड़ाया

ज़ुहैर इस सुल्ह की हिकमत यही है
सितम का धड़ कहीं गर्दन कहीं है


हसन कुल आयत ए रब्बे जली है
हसन को याद करना बंदगी है

हसन नूर-ए-ख़ुदा की रौशनी है
हसन सब्र-ओ-वफ़ा की ज़िन्दगी है

हसन जो फातिमा का दिल नशीं हैं
हसन जान ए दिल ए मौला अली है

नबी गोदी में लेकर देखते हैं
हसन में किस क़दर की दिलकशी है

ना करना जंग ये बतला रहा है
हसन की राह अम्न-ओ-आश्ती है

है हिकमत और अमल दोनों बराबर
हसन की सुल्ह भी सुल्ह ए नबी है

नक़्शे पा इनकी सखावत का चलन है
हसन खुद भी सखी इब्ने सखी है

सभी सुन ले ये आशिक़ माविया के
सुलह को तोड़ देना बुज़दिली है

ज़ुहैर इस सुल्ह की हिकमत यही है
सितम का धड़ कहीं गर्दन कहीं है