Zulmaten Sab Door Hongi Aur Ujale Aayenge

देख लेना के मुनाफ़िक़ ख़ुद-ब-ख़ुद मर जाएँगे
बद नसब तो नारा ए हैदर से ही डर जाएँगे
और ज़ालिम नस्ल के पत्ते तलक गिर जाएँगे
क़ायम-ए-आल-ए-मुहम्मद ग़ैब से जब आएँगे
ज़ुल्मतें सब दूर होंगी और उजाले आएँगे

अपने जद सा अद्ल लेकर आएँगे मेरे इमाम
सारी दुनिया देख लेगी फिर से हैदर का निज़ाम
बहर ए हक़ महदी करेंगे हक़ का सारा इंतज़ाम
क़हर बनकर ज़ुल्म पर जब वो अदालत लाएँगे
ज़ुल्मतें सब दूर होंगी और उजाले आएँगे

अंबिया आकर खड़े होंगे वहाँ पर सफ़-ब-सफ़
सबसे पहले ख़ाना-ए-हक़ को मिलेगी ये शरफ़
नूर-ए-हक़ दुनिया में फैलेगा यहीं से हर तरफ़
ख़ाना-ए-काबा की छत पर जब अलम लहराएँगे
ज़ुल्मतें सब दूर होंगी और उजाले आएँगे

या इलाही कर अता इस बे-क़रारी को क़रार
ख़त्म कर दे आख़री हुज्जत का अब तो इंतज़ार
ख़ून की प्यासी है सदियों से अली की ज़ुल्फ़िकार
ख़ौफ़ के साए मिटेंगे, हौसले बढ़ जाएँगे
ज़ुल्मतें सब दूर होंगी और उजाले आएँगे

रह के परदे में हमारी हर ख़बर रखता है जो
जो ख़यालों में बसा है, दिल में भी गहरा है जो
वो रुख़-ए-अनवर दिखा दे, यूसुफ़-ए-ज़हरा है जो
रौज़ा-ए-मिस्मार पर फिर से बहारें लाएँगे
ज़ुल्मतें सब दूर होंगी और उजाले आएँगे

है दुआ इतनी के जब तक दम में दम होगा ज़ुहैर
नुसरत-ए-हुज्जत का जज़्बा कम नहीं होगा ज़ुहैर
मर गए जो हम तो फिर हम पर करम होगा ज़ुहैर
क़ब्र से हमको उठाने ख़ुद फ़रिश्ते आएँगे
ज़ुल्मतें सब दूर होंगी और उजाले आएँगे

Ali Akbar Main Husn-e-Ahmad-e-Mukhtaar Milta Hai

शबीह-ए-मुस्तफ़ा का ये निराला वार मिलता है
सितम का सारा लश्कर सरहदों से पार मिलता है

बहत्तर कोशिशे कर ली बहत्तर बार हारा है
सितम हैरान है हर बार ही इंकार मिलता है

अली वाले का दुनिया में ये ही किरदार मिलता है
नई मिदहत सुनाता है उसे जब दार मिलता है

भले सूली चढ़ाए या हमारी जान ही ले ले
क़लम कर दे ज़बाँ फिर भी, उसे इंकार मिलता है

वो असग़र हों या अकबर हों या फिर इब्ने मज़ाहिर हों
अलग हर सिन में नुसरत का वही मेयार मिलता है

अगर साया ना होता तो मुकम्मल मुस्तफा होते
अली अकबर में हुस्ने अहमद ए मुख़्तार मिलता है

अज़ान ए सुबह ए आशूरा ये कहती ज़ुहैर हमसे
शऊर ए हक़ जो रखता है वो ही बेदार मिलता है

America & Iran War Preparation

आसमाँ का थूका तेरे मुंह पे आने ही लगा
सब ये ज़ाहिर हो रहा है रंग तेरी मात का

इतनी पाबन्दी लगाई थीं भला किस बात की
जब लगा दीं थीं तो फिर ये मारका किस बात का

Aasiya Ke Hathon Pe Jo Hina Ki Lali Hai (Moh. Bagla Arshiya ki padosn)

आसिया के हाथों पे जो हिना की लाली है
नाज़िया ये कहती हैं हर अदा निराली है

नूर और नज़र दोनों इस ख़ुशी से रोते हैं
चेहरे पर ख़ुशी चमके आँखों में भी लाली है
आसिया के हाथों पे जो हिना की लाली है
नाज़िया ये कहती हैं हर अदा निराली है

दादा आज जन्नत से देखते हैं दुल्हन को
दादी की दुआओं ने क़िस्मतें सँवारी है
आसिया के हाथों पे जो हिना की लाली है
नाज़िया ये कहती हैं हर अदा निराली है

ताए ताई दुल्हन के सर पा हाथ रखते हैं
चाचा चाची दोनों ने खूब ही दुआ दी है
आसिया के हाथों पे जो हिना की लाली है
नाज़िया ये कहती हैं हर अदा निराली है

नानी आज जन्नत से ये नज़ारा करती हैं
नाना जान की गुड़िया आज कितनी प्यारी है
आसिया के हाथों पे जो हिना की लाली है
नाज़िया ये कहती हैं हर अदा निराली है

मामा मामी सबकी ही साथ में दुआएँ हैं
आज उनकी प्यारी की शादी होने वाली है
आसिया के हाथों पे जो हिना की लाली है
नाज़िया ये कहती हैं हर अदा निराली है

ख़ाला ख़ालू कहते हैं कि नसीब रोशन हो
आसिया की शादी की हर अदा निराली है
आसिया के हाथों पे जो हिना की लाली है
नाज़िया ये कहती हैं हर अदा निराली है

भाई बहने सब हँस कर रस्मों को निभाते हैं
नग़्मों की शरारत है और ख़ुशी की ताली है
आसिया के हाथों पे जो हिना की लाली है
नाज़िया ये कहती हैं हर अदा निराली है

Awwal Tumhen Aana Hai, Aakhir Tumhen Aana Hai

आला ये घराना था, आला ये घराना है
हर दौर ने माना था, हर दौर ने माना है

परदे में अभी क़ायम अहमद की निशानी है
रौशन वो ज़माना था, रौशन ये ज़माना है

है कैसा मुसलमां वो, पढ़ता है नमाज़ें तो
अहमद की ना माना था, हैदर को ना माना है

जिब्रील हों, काबा हो, मस्जिद हो या मिम्बर हो
हैदर का दिवाना था हैदर का दिवाना है

अव्वल तुम्हें आना है, आखिर तुम्हें आना है
कल कलमा पढ़ाया था, अब पर्दा उठाना है

तौहीद बताने को फिर उसको बचाने को
अव्वल तुम्हें आना है आखिर तुम्हें आना है

मजलिस का तबर्रुक हो, अश्क-ए-ग़म-ए-सर्वर हो
अनमोल खज़ाना था अनमोल खज़ाना है

ज़हरा ओ अली, शब्बर-शब्बीर के क़ातिल का
अंदाज़ ज़नाना था अंदाज़ ज़नाना है

आपस में लड़ाए वो, या बाग़े फ़िदक लूटे
दोज़ख में ही जाना था दोज़ख में ही जाना है

ये काम बड़े लेकर आये हैं अली असग़र
बैअत को हराना था, ज़ालिम को रुलाना है

हर दौर के मरजा पर, या फ़र्श-ए-ग़म-ए-शह पर
ज़ालिम का निशाना था ज़ालिम का निशाना है

क्यों उनको बुलाना है आना ही नहीं जिनको
कल कोई बहाना था अब कोई बहाना है

हर दौर में ये सबकी नस्लों का पता देगा
खैबर में जो पाया था, नारा वो लगाना है

कहता है ज़ुहैर अब भी ग़ाज़ी का अलम हमसे
सर को ना झुकाया था सर को ना झुकाना है

Shah Ka Gham Farshe Aza Zaiban Ka Tha Zainab Ka Hai

शह का ग़म फ़र्शे अज़ा ज़ैनब का था ज़ैनब का है
हश्र तक ये सिलसिला ज़ैनब का था ज़ैनब का है

बाप की ज़ीनत है और मक़सद ए शह की अमीन
मर्तबा ये बा खुदा ज़ैनब का था ज़ैनब का है

काम जिसने ले लिया शमशीर का तक़रीर से
क़ैद में वो हौसला ज़ैनब का था ज़ैनब का है

मुफ्तिए बिदअत तेरे फतवों ने ज़ाहिर कर दिया
खौफ तारी ज़ुल्म पा ज़ैनब का था ज़ैनब का है

हक़ परस्ती, शह का मक़सद, कर्बला से खुल्द तक
इस सफर का रास्ता ज़ैनब का था ज़ैनब का है

मदह खानी शह का मातम जज़्बा ए नुसरत ज़ुहैर
जो करम तुझ पर हुआ ज़ैनब का था ज़ैनब का है

Jashn-e-Aayat-o-Tafseer

बिगड़ी हुई बनाने को तक़दीर आए हैं
हम लोग सुनने आयत ओ तफ़्सीर आए हैं

ज़ेरे किसा जब आ गया वो नूरे पंजतन
जिब्रील ले के आया ए तत्हीर आए हैं

तरतीब इस तरह से विलादत की बन गयी
पहले बहन तो बाद में शब्बीर आए हैं

Ameen e Maqsad e Shabber hain Zainab

अमीने मक़सद ए शब्बीर हैं ज़ैनब
अली की बोलती तस्वीर हैं ज़ैनब

अली ओ फातिमा शब्बीर ओ शब्बर के
चमकते नूर की तनवीर हैं ज़ैनब

Jisne Dare Hussain Pa Sar Ko Jhuka Liya

हुर की तरह नसीब को अपने जगा लिया
जिसने दरे हुसैन पा सर को झुका लिया

हमने जो शह का फ़र्शे मसर्रत बिछा लिया
हर एक यज़ीद ज़ादे ने मुँह को छुपा लिया

बे रोक टोक सीधा जहन्नम में जायेगा
जो रास्ता हुसैन से हट कर बना लिया

आग़ोश ए फातिमा में हैं शब्बीर इस तरह
इस्मत ने जैसे गोद में क़ुरआन उठा लिया

फितरुस को बालो पर भी मिले ज़िन्दगी मिली
झूले से उसने ख़ुद को ज़रा-सा मिला लिया

ज़ालिम की पूरी फ़ौज ही सकते में आ गयी
रन में ज़रा सग़ीर यूँ ही मुस्कुरा लिया

मुस्कान से ही फ़ौज में सब खलबली सी है
क्या होगा गर सग़ीर ने नेज़ा उठा लिया

जाऊं ना में पलट के यही आरज़ू रही
इक बार जिसने रोज़े का दीदार पा लिया

मंज़र जो कर्बला के मयस्सर हुए हमें
नज़रों के रास्ते उन्हें दिल में बसा लिया

नज़रों से अपनी रोका था लश्कर दिलेर ने
तुमसे हटेंगे खेमें भला सोच क्या लिया

इस पार आ गया तो वो उस पार जायेगा
जिसने भी एक क़दम मेरे खत से बढ़ा लिया

हम पर ज़ुहैर फातिमा ज़ेहरा की है अता
हमने तो अपना अश्क भी मोती बना लिया

Har Saans Ne Har Baar Jataya KE KHUDA HAI

दिन-रात की गर्दिश ने बताया के ख़ुदा है
हर साँस ने हर बार जताया के ख़ुदा है

जब बाद ए सहर गाने लगी रब का तराना
चिड़ियों ने चहक कर वो सुनाया के ख़ुदा है

सेहरा ने कभी लू ने तो सूरज की तपिश ने
हर शाम ने एहसास कराया के खुदा है

बे इज़्न ए खुदा हिलते नहीं पेडों के पत्ते
मौसम ने बदल कर ये दिखाया के ख़ुदा है

हर फर्द से हर फर्द जुदा रंग जुदा है
पर एक सी धड़कन ने बताया के खुदा है

हर जिस्म हर इक रूह अमानत है खुदा की
दोनों ने अलग होके दिखाया के खुदा है

झलकी ही सही तूर पे ज़ाहिर तो हुआ था
मूसा ने तजल्ली में ये पाया के खुदा है

ख़ालिक़ को उठाना पड़ा तब अर्श के ऊपर
जब ईसा को कहने लगी दुनिया के खुदा है

आए हैं सवा लाख नबी ये ही बताने
ये प्यारे मोहम्मद ने सिखाया के खुदा है

पैकर से नबी के भी हक़ीक़त ये अयाँ है
बस जिस्म ज़मीं पर है, ना साया के खुदा है

सदियों का सफर लम्हों में कर आए मोहम्मद
मेराज ने अहमद की बताया के खुदा है

लो आमद ए हैदर के लिए खिल गए पत्थर
दीवार ने काबे की दिखाया के खुदा है

काबे में विलादत हुई आते ही अली ने
आग़ोश-ए-मुहम्मद में सुनाया के ख़ुदा है

कहते थे अली बर सरे मिम्बर जो सलूनी
दावा ए सलूनी था ये दावा के खुदा है

रिश्ता लिए ज़ेहरा से अली का वो सितारा
दहलीज़ पे आकर ये पुकारा के खुदा है

आए जो हसन सारा ज़माना हुआ शाहिद
किरदार में उनके नज़र आया के खुदा है

शब्बीर ने तौहीद बचाई है लहू से
सर दे दिया पर सर ना झुकाया के खुदा है

है कोई जो हक़ बात पे सर देने को आए
अकबर ने अज़ाँ देके बुलाया के खुदा है

जब गर्द ए सितम दिल से हटी ज़ेहन पुकारा
हुर छोड़ के बातिल इधर आया के खुदा है

वो सिर्फ चरागों का बुझाना तो नहीं था
सर्वर ने अंधेरों को जगाया के खुदा है

असग़र भी बताने को ये ही आ गए रन में
मुस्कान को होठों पे सजाया के खुदा है

हक़ बात पे सर देना फ़रीज़ा है हमारा
सर सजदे में सर्वर ने झुकाया के खुदा है

मेहदी की ये ग़ैबत भी हकीकत है खुदा की
हर राज़ से उठ जायेगा पर्दा के खुदा है

तौहीद भला कैसे लिखी जाए ज़ुहैर अब
अल्फ़ाज़ ने फिर साथ निभाया के खुदा है