अमीने मक़सद ए शब्बीर हैं ज़ैनब
अली की बोलती तस्वीर हैं ज़ैनब
अली ओ फातिमा शब्बीर ओ शब्बर के
चमकते नूर की तनवीर हैं ज़ैनब
अमीने मक़सद ए शब्बीर हैं ज़ैनब
अली की बोलती तस्वीर हैं ज़ैनब
अली ओ फातिमा शब्बीर ओ शब्बर के
चमकते नूर की तनवीर हैं ज़ैनब
हुर की तरह नसीब को अपने जगा लिया
जिसने दरे हुसैन पा सर को झुका लिया
हमने जो शह का फ़र्शे मसर्रत बिछा लिया
हर एक यज़ीद ज़ादे ने मुँह को छुपा लिया
बे रोक टोक सीधा जहन्नम में जायेगा
जो रास्ता हुसैन से हट कर बना लिया
आग़ोश ए फातिमा में हैं शब्बीर इस तरह
इस्मत ने जैसे गोद में क़ुरआन उठा लिया
फितरुस को बालो पर भी मिले ज़िन्दगी मिली
झूले से उसने ख़ुद को ज़रा-सा मिला लिया
ज़ालिम की पूरी फ़ौज ही सकते में आ गयी
रन में ज़रा सग़ीर यूँ ही मुस्कुरा लिया
मुस्कान से ही फ़ौज में सब खलबली सी है
क्या होगा गर सग़ीर ने नेज़ा उठा लिया
जाऊं ना में पलट के यही आरज़ू रही
इक बार जिसने रोज़े का दीदार पा लिया
मंज़र जो कर्बला के मयस्सर हुए हमें
नज़रों के रास्ते उन्हें दिल में बसा लिया
नज़रों से अपनी रोका था लश्कर दिलेर ने
तुमसे हटेंगे खेमें भला सोच क्या लिया
इस पार आ गया तो वो उस पार जायेगा
जिसने भी एक क़दम मेरे खत से बढ़ा लिया
हम पर ज़ुहैर फातिमा ज़ेहरा की है अता
हमने तो अपना अश्क भी मोती बना लिया
दिन-रात की गर्दिश ने बताया के ख़ुदा है
हर साँस ने हर बार जताया के ख़ुदा है
जब बाद ए सहर गाने लगी रब का तराना
चिड़ियों ने चहक कर वो सुनाया के ख़ुदा है
सेहरा ने कभी लू ने तो सूरज की तपिश ने
हर शाम ने एहसास कराया के खुदा है
बे इज़्न ए खुदा हिलते नहीं पेडों के पत्ते
मौसम ने बदल कर ये दिखाया के ख़ुदा है
हर फर्द से हर फर्द जुदा रंग जुदा है
पर एक सी धड़कन ने बताया के खुदा है
हर जिस्म हर इक रूह अमानत है खुदा की
दोनों ने अलग होके दिखाया के खुदा है
झलकी ही सही तूर पे ज़ाहिर तो हुआ था
मूसा ने तजल्ली में ये पाया के खुदा है
ख़ालिक़ को उठाना पड़ा तब अर्श के ऊपर
जब ईसा को कहने लगी दुनिया के खुदा है
आए हैं सवा लाख नबी ये ही बताने
ये प्यारे मोहम्मद ने सिखाया के खुदा है
पैकर से नबी के भी हक़ीक़त ये अयाँ है
बस जिस्म ज़मीं पर है, ना साया के खुदा है
सदियों का सफर लम्हों में कर आए मोहम्मद
मेराज ने अहमद की बताया के खुदा है
लो आमद ए हैदर के लिए खिल गए पत्थर
दीवार ने काबे की दिखाया के खुदा है
काबे में विलादत हुई आते ही अली ने
आग़ोश-ए-मुहम्मद में सुनाया के ख़ुदा है
कहते थे अली बर सरे मिम्बर जो सलूनी
दावा ए सलूनी था ये दावा के खुदा है
रिश्ता लिए ज़ेहरा से अली का वो सितारा
दहलीज़ पे आकर ये पुकारा के खुदा है
आए जो हसन सारा ज़माना हुआ शाहिद
किरदार में उनके नज़र आया के खुदा है
शब्बीर ने तौहीद बचाई है लहू से
सर दे दिया पर सर ना झुकाया के खुदा है
है कोई जो हक़ बात पे सर देने को आए
अकबर ने अज़ाँ देके बुलाया के खुदा है
जब गर्द ए सितम दिल से हटी ज़ेहन पुकारा
हुर छोड़ के बातिल इधर आया के खुदा है
वो सिर्फ चरागों का बुझाना तो नहीं था
सर्वर ने अंधेरों को जगाया के खुदा है
असग़र भी बताने को ये ही आ गए रन में
मुस्कान को होठों पे सजाया के खुदा है
हक़ बात पे सर देना फ़रीज़ा है हमारा
सर सजदे में सर्वर ने झुकाया के खुदा है
मेहदी की ये ग़ैबत भी हकीकत है खुदा की
हर राज़ से उठ जायेगा पर्दा के खुदा है
तौहीद भला कैसे लिखी जाए ज़ुहैर अब
अल्फ़ाज़ ने फिर साथ निभाया के खुदा है
तेरा रजब को काबे से ऐलान हो गया
पैदा जहाँ में काबे का सुलतान हो गया
था इस क़दर अली की मोहब्बत में संग ए बैत
मिस्ले गुलाब खिल के गुलिस्तान हो गया
जो दर बना था काबे में अब तक छुपा नहीं
जब भी छुपाया जिसने परेशान हो गया
हैरत में अक़्ल सजदे में तारीख़ झुक गयी
दस्ते नबी में बोलता क़ुरआन हो गया
जूं ही अली ने झूले में अजदर को दो किया
नाकाम एक लम्हे में शैतान हो गया
किसका लहू नजिस है भला किसका पाक तर
नारा अली का नस्ल की पहचान हो गया
नाते नबी के बाद सना ए अली हुई
मैं क्या कहूं कि हक़ का ये ऐलान हो गया
मौला कहा है मौला अली को नबी ने खुद
बखखिन कहा था खुद ही तू अनजान हो गया
हर एक अपनी क़ब्र में सर फोड़ने लगा
जो भी यहाँ ग़दीर से अंजान हो गया
तेरा रजब को काबे का सम्मान हो गया
आए अली तो काबे का उथ्थान होगया
था इस क़दर अली की मोहब्बत में संग ए बैत
मिस्ले गुलाब काबे का पाशान हो गया
जो दर बना था काबे में अब तक छुपा नहीं
जितना गणित लगा लिया विज्ञान हो गया
जूं ही अली ने झूले में अजदर को दो किया
नाकाम सारा कुफ्र का अभियान हो गया
हैरत में अक़्ल सजदे में तारीख़ झुक गयी
दो दिन का एक सग़ीर जो बलवान हो गया
नाते नबी के बाद सना ए अली हुई
हर लफ्ज़ शेख जी के लिए बान हो गया
किसका लहू नजिस है भला किसका पाक तर
नारे से एक सारा अनूमान हो गया
मौला कहा नबी ने तो ईमान खिल उठा
रोज़े ग़दीर सारा समाधान हो गया
हर एक अपनी क़ब्र में सर फोड़ने लगा
जो भी यहाँ ग़दीर से अज्ञान हो गया
जब आयी ये सदा के लहद से उठो ज़ुहैर
मेरा कफ़न ही मेरा परीधान हो गया
अब कैसे भला होगी मिदहत अली असग़र की
जब फूल चुरा लाए कुदरत अली असग़र की
मुस्कान खुदा तूने फूलों को अता कर दी
बस मेरी ज़बाँ पर हो मिदहत अली असग़र की
शब्बीर सर-ए-मैदाँ बेशीर यूँ लाए हैं
दुनिया को दिखानी थी क़ुदरत अली असग़र की
तलवार नहीं फिर भी असग़र का हुनर देखो
नौ लाख पे छाई है हैबत अली असग़र की
छह माह के सिन में ही ज़ालिम को रुला डाला
क्या होती जवाँ होकर ताक़त अली असग़र की
जब नाम-ए-अली असग़र मैं लब पे सजाता हूँ
साँसों से भी आती है निकहत अली असग़र की
लरज़े में ज़मीं रहती ये ताब ना ला पाती
तनहा जो अगर होती तुरबत अली असग़र की
वो कौन सा बचपन है जो सदियों पे भारी है
छह माह का सिन शह की नुसरत अली असग़र की
वो शक्ल क़सीदे की लेती है ज़ुहैर अक्सर
लबरेज़ हुई जब भी उल्फत अली असग़र की
अब्बास ए अलमदार वफाओं का खुदा है
खुद जिसके लिए दस्त-ए-ख़ुदा, दस्त-ए-दुआ है
जो शेरे खुदा नज़रे खुदा दस्ते खुदा है
अब्बास को पाने के लिए दस्ते दुआ है
शब्बीर की नुसरत में वो हर लम्हा खड़ा है
खत जिसका ही दुश्मन के लिए मिस्ले क़ज़ा है
लश्कर वो जो आँखों में सामाता भी नहीं था
अब्बास की हैबत से वही भाग रहा है
अब पास भी दरिया के कोई आए तो कैसे
अब्बास तराई में अली बनके खड़ा है
था शोर तराई में अजल आ गई भागो
अब्बास तराई में अली बनके खड़ा है
हैरान है खुद तिश्ना-लबी तेरे अमल से
ठोकर में था पानी तू मगर प्यासा लड़ा है
अब तक भी तो बेचैन है दर्याओं का पानी
वो कौन था जो प्यासा इसे छोड़ गया है
जिसने कटे हाथों से है इस्लाम सभाला
वो सारे ज़माने में सकीना का चचा है
मोहताज भी तो आके ग़नी हो गए दर पर
ग़ाज़ी का है दरबार ये दरबार ए अता है
इमरान तेरा जिसको भी इरफ़ान हो गया
वो आदमी हक़ीक़ी मुसलमान हो गया
ये शान भी तो आपके घर को मिली फ़क़त
हर एक बच्चा बोलता क़ुरआन हो गया
दर पाँचवा खुला है इमामत का दोस्तों
बाक़िर जहाँ में आए तो ऐलान हो गया
सज्जाद का ये फ़ैज़ है बाक़िर की शक्ल में
इनका भी इल्म दीन की पहचान हो गया
कब बोलना है, कितना, कहाँ और किस लिए
तब्लीग-ए-हक़ जहान में आसान हो गया
हर्फ़-ओ-बयाँ को नूर मिला फ़िक्र को ज़िया
उल्फत का आगही का भी सामान हो गया
मक़तब खुला तो ज़ुल्म का साया सिमट गया
रौशन हर एक दीन का अरकान हो गया
मैंने ज़ुहैर मदह ओ सना में लिखा जो सब
जब जब पढ़ा है खुद भी मैं हैरान हो गया
दर पर तक़ी के जिसने भी सर को झुका लिया
बिगड़ी हुई हयात को उसने बना लिया
फ़ज़्ले खुदा से अपना मुक़द्दर जगा लिया
जशने तक़ी में आके क़सीदा सुना लिया
आमद हुई है मौला तक़ी की जहाँ में आज
यानी इमामतों ने नवें दर को पा लिया
बचपन से ही वक़ारे इमामत की शान है
तक़वे ने इनके दर से मुक़द्दर बना लिया
कम सिन थे जब के इल्म ए इमामत के सामने
बातिल के हर सवाल ने मुँह को छुपा लिया
मुट्ठी जो बंद की थी वो खुलना था खुल गई
बातिल ने खुद को खुद से ही रुसवा करा लिया
हर बार आज़माता था मामून इल्म से
हर बार इल्मे मौला तक़ी ने हरा लिया
दरबार में जो इल्म की बातें अयाँ हुई
बातिल खमोश हो गया सर को झुका लिया
इल्मे खुदा का बहता समंदर इमाम हैं
हमने तो मोती रोल लिए तुमने क्या लिया
बाबुल मुराद भी हैं ये जव्वाद भी यही
मैंने दुआ में नाम ए तक़ी बारहा लिया
अकबर अली में जशने तक़ी रात भर हुआ
इश्क़ ए तक़ी की गर्मी ने सबको समा लिया
तुझ पर ज़ुहैर इनकी अता है ये बा खुदा
मिदहत से इनकी लफ्ज़ को मोती बना लिया
मेराज पर जो ताइर ए फिकरे रसा गया
तब लौहे दिल पे नामे मुहम्मद लिखा गया
कौसर रसूल अर्श अली की विलायतें
यकजा लिखे तो फातिमा ज़ेहरा पढ़ा गया
अल्लाह ने बुला के अता की रसूल को
बेटी वो जिसको उम्मे अबीहा कहा गया
बेटी नबी की एक फ़क़त फातिमा ही थीं
खुलके नबी को बाप का रिश्ता दिया गया
असहाब सारे छत से नज़ारे में गुम रहे
उतरा सितारा रिश्ता दिया और चला गया
गर जानना है कौन भला अहले बैत हैं
ये देखो कौन कौन ही ज़ेरे किसा गया
रोज़ा नमाज़ हज ये मुकम्मल हुए हैं कब
जब हाजियों को रोक के मौला दिया गया
जिसने नबी की बेटी का घर तक जला दिया
सद हैफ़ ये के उसको खलीफा कहा गया
ये मन्क़बत सलाम ये अश्के अज़ा ज़ुहैर
था मुख्तसर लहद में बड़े काम आ गया
क्या ज़रूरत हो भला बेशीर की हथियार की
ज़ालिमों पर छाई है हैबत लबों के वार की
दो लबों से ही महाज़े जंग को सर कर लिया
शान है बेशीर में सब हैदर ए कर्रार की
मुस्कराहट ने अली असग़र की साबित कर दिया
हैसियत कुछ भी नहीं है हुरमुला के वार की
बच्चा बच्चा कर रहा है ज़िक्रे हैदर देखिये
ये ज़मानत है ज़बान-ए-मीसम-ए-तम्मार की
सुनके हैदर के फ़ज़ाइल तिलमिलाना देखिये
बुघ़्ज़-ए-हैदर ने ही जिनकी ज़िन्दगी दुश्वार की
मर के हर एक मुनकिर ए हैदर को ये अफ़सोस है
बुग़ज़े हैदर में गुज़ारी ज़िन्दगी बेकार की
मर्ग पर मेरे खुली रह जाएँ तो मत ढाँपना
मुन्तज़िर हैं ये निगाहें आखरी सरकार की
मदह ख्वानी शह का मातम, जज़्बा ए नुसरत ज़ुहैर
शीर ए मादर ने हर एक खूबी मेरी बेदार की