Abbas E Alamdaar Wafaon Ka Khuda Hai

अब्बास ए अलमदार वफाओं का खुदा है
खुद जिसके लिए दस्त-ए-ख़ुदा, दस्त-ए-दुआ है

जो शेरे खुदा नज़रे खुदा दस्ते खुदा है
अब्बास को पाने के लिए दस्ते दुआ है

शब्बीर की नुसरत में वो हर लम्हा खड़ा है
खत जिसका ही दुश्मन के लिए मिस्ले क़ज़ा है

लश्कर वो जो आँखों में सामाता भी नहीं था
अब्बास की हैबत से वही भाग रहा है

अब पास भी दरिया के कोई आए तो कैसे
अब्बास तराई में अली बनके खड़ा है

था शोर तराई में अजल आ गई भागो
अब्बास तराई में अली बनके खड़ा है

हैरान है खुद तिश्ना-लबी तेरे अमल से
ठोकर में था पानी तू मगर प्यासा लड़ा है

अब तक भी तो बेचैन है दर्याओं का पानी
वो कौन था जो प्यासा इसे छोड़ गया है

जिसने कटे हाथों से है इस्लाम सभाला
वो सारे ज़माने में सकीना का चचा है

मोहताज भी तो आके ग़नी हो गए दर पर
ग़ाज़ी का है दरबार ये दरबार ए अता है

Baqir Jahan Main Aaye to Elaan Ho Gaya

इमरान तेरा जिसको भी इरफ़ान हो गया
वो आदमी हक़ीक़ी मुसलमान हो गया

ये शान भी तो आपके घर को मिली फ़क़त
हर एक बच्चा बोलता क़ुरआन हो गया

दर पाँचवा खुला है इमामत का दोस्तों
बाक़िर जहाँ में आए तो ऐलान हो गया

सज्जाद का ये फ़ैज़ है बाक़िर की शक्ल में
इनका भी इल्म दीन की पहचान हो गया

कब बोलना है, कितना, कहाँ और किस लिए
तब्लीग-ए-हक़ जहान में आसान हो गया

हर्फ़-ओ-बयाँ को नूर मिला फ़िक्र को ज़िया
उल्फत का आगही का भी सामान हो गया

मक़तब खुला तो ज़ुल्म का साया सिमट गया
रौशन हर एक दीन का अरकान हो गया

मैंने ज़ुहैर मदह ओ सना में लिखा जो सब
जब जब पढ़ा है खुद भी मैं हैरान हो गया

Taqve Ne Inke Dar Se Muqaddar Bana Liya

दर पर तक़ी के जिसने भी सर को झुका लिया
बिगड़ी हुई हयात को उसने बना लिया

फ़ज़्ले खुदा से अपना मुक़द्दर जगा लिया
जशने तक़ी में आके क़सीदा सुना लिया

आमद हुई है मौला तक़ी की जहाँ में आज
यानी इमामतों ने नवें दर को पा लिया

बचपन से ही वक़ारे इमामत की शान है
तक़वे ने इनके दर से मुक़द्दर बना लिया

कम सिन थे जब के इल्म ए इमामत के सामने
बातिल के हर सवाल ने मुँह को छुपा लिया

मुट्ठी जो बंद की थी वो खुलना था खुल गई
बातिल ने खुद को खुद से ही रुसवा करा लिया

हर बार आज़माता था मामून इल्म से
हर बार इल्मे मौला तक़ी ने हरा लिया

दरबार में जो इल्म की बातें अयाँ हुई
बातिल खमोश हो गया सर को झुका लिया

इल्मे खुदा का बहता समंदर इमाम हैं
हमने तो मोती रोल लिए तुमने क्या लिया

बाबुल मुराद भी हैं ये जव्वाद भी यही
मैंने दुआ में नाम ए तक़ी बारहा लिया

अकबर अली में जशने तक़ी रात भर हुआ
इश्क़ ए तक़ी की गर्मी ने सबको समा लिया

तुझ पर ज़ुहैर इनकी अता है ये बा खुदा
मिदहत से इनकी लफ्ज़ को मोती बना लिया

Beti Vo Jisko Umme Abeeha Kaha Gaya

मेराज पर जो ताइर ए फिकरे रसा गया
तब लौहे दिल पे नामे मुहम्मद लिखा गया

कौसर रसूल अर्श अली की विलायतें
यकजा लिखे तो फातिमा ज़ेहरा पढ़ा गया

अल्लाह ने बुला के अता की रसूल को
बेटी वो जिसको उम्मे अबीहा कहा गया

बेटी नबी की एक फ़क़त फातिमा ही थीं
खुलके नबी को बाप का रिश्ता दिया गया

असहाब सारे छत से नज़ारे में गुम रहे
उतरा सितारा रिश्ता दिया और चला गया

गर जानना है कौन भला अहले बैत हैं
ये देखो कौन कौन ही ज़ेरे किसा गया

रोज़ा नमाज़ हज ये मुकम्मल हुए हैं कब
जब हाजियों को रोक के मौला दिया गया

जिसने नबी की बेटी का घर तक जला दिया
सद हैफ़ ये के उसको खलीफा कहा गया

ये मन्क़बत सलाम ये अश्के अज़ा ज़ुहैर
था मुख्तसर लहद में बड़े काम आ गया

Shaan Hai Besheer Main Sab Haider-e-Karrar Ki

क्या ज़रूरत हो भला बेशीर की हथियार की
ज़ालिमों पर छाई है हैबत लबों के वार की

दो लबों से ही महाज़े जंग को सर कर लिया
शान है बेशीर में सब हैदर ए कर्रार की

मुस्कराहट ने अली असग़र की साबित कर दिया
हैसियत कुछ भी नहीं है हुरमुला के वार की

बच्चा बच्चा कर रहा है ज़िक्रे हैदर देखिये
ये ज़मानत है ज़बान-ए-मीसम-ए-तम्मार की

सुनके हैदर के फ़ज़ाइल तिलमिलाना देखिये
बुघ़्ज़-ए-हैदर ने ही जिनकी ज़िन्दगी दुश्वार की

मर के हर एक मुनकिर ए हैदर को ये अफ़सोस है
बुग़ज़े हैदर में गुज़ारी ज़िन्दगी बेकार की

मर्ग पर मेरे खुली रह जाएँ तो मत ढाँपना
मुन्तज़िर हैं ये निगाहें आखरी सरकार की

मदह ख्वानी शह का मातम, जज़्बा ए नुसरत ज़ुहैर
शीर ए मादर ने हर एक खूबी मेरी बेदार की

Jafar Hai Naam Aapko Sadiq Laqb Mila

हर जशने सादिक़ ऐन में ये भी अजब मिला
जो शख्स भी मिला वो हमें बा अदब मिला

उल्फत खुदा की दीन भी दुनिया का इल्म भी
बाक़िर के लाल आपके दर से ये सब मिला

इल्मो अमल में आप का सानी कोई नहीं
जाफर है नाम आपको सादिक़ लक़ब मिला

इस दर पे मांगने की ज़रूरत नहीं पड़ी
जो आ गया यहाँ पे उसे बे तलब मिला

मुनकिर जो इनके दर का मिले उस से पूछना
कितना मिला कहाँ से मिला और कब मिला

मिदहत ज़ुहैर इनकी बराए सवाब कर
सदक़ा है इनके दर का तुम्हें खुश लक़ब मिला

Ya Ali Ya Ali Ya Ali Ya Ali – Khaybar

या अली या अली या अली या अली
या अली या अली या अली या अली
या अली या अली या अली या अली

मेरा मौला अली मेरा आक़ा अली
आसमानो ज़मीं पर हुकूमत तेरी
दिन तेरी रौशनी रात मर्ज़ी तेरी
हर सितारों ने की है तेरी नौकरी
तेर सदक़े में नबियों की मुश्किल टली
या अली या अली या अली या अली

मैंने खैबर से जब पूँछा ये माजरा
जंग में क्या हुआ कुछ बता तो ज़रा
जब ना थे मुर्तज़ा तो लड़ा कौन था
इतने दिन क्यों लगे क्यों फतह ना हुआ
किसको खैबर में अहमद ने आवाज़ दी
या अली या अली या अली या अली

बोला खैबर के अल मुख़्तसर यूँ हुआ
जंगे का सारा नक़्शा था पलटा हुआ
लड़ने मरहब से कोई भी जाता ना था
लड़ने जाता था कोई तो टिकता ना था
एक भी तो ना था सब में कोई जरी
या अली या अली या अली या अली

सूरमा सब बने मात खाते रहे
झंडे जाते रहे डंडे आते रहे
मात खाते रहे मुँह छुपाते रहे
अपनी ना कामियां सब सुनाते रहे
मर्दे मैदाँ तो उनमे ना निकला कोई
या अली या अली या अली या अली

कितने असहाब थे सब बड़े से बड़े
सबसे आगे थे वो जो ससुर भी हुए
लड़ने वो भी गए थे बड़ी शान से
पहुँचे थे शान से पलटे हैरान से
बे ज़ुबाँ को सुनाने लगे जो खरी
या अली या अली या अली या अली

कितने हज़रात का आना जाना हुआ
ख़त्म हर एक का हर बहाना हुआ
दिन गुज़रते रहे एक ज़माना हुआ
पर खुदा ने था कुछ और ठाना हुआ
आए जिब्रील ले कर वहीं पर वही
या अली या अली या अली या अली

बोले अहमद अलम अब मैं दूँगा उसे
गैर ए फर्रार हो जीत हासिल करे
कितने अलक़ाब थे जो नबी ने कहे
एक लक़ब में भी हमसर ना छोटे बड़े
दिन वो ढलने लगा रात होने लगी
या अली या अली या अली या अली

उफ़ अलम की वो चाहत थी असहाब में
नींद सबकी उडी थी अलम के लियें
नींद कैसी खुली आँखों से खाब में
सोचते थे अलम कल मिलेगा हमें
सोचते सोचते ही सुबह हो गयी
या अली या अली या अली या अली

दिन जो निकला अज़ाने सहर जो हुई
तेज़ धड़कन जो थी तेज़ तर हो गयीं
हम को देंगे अलम बस गुमां था यही
जिस से डरते थे आखिर हुआ फिर वही
मुस्तफा ने पढ़ी फिर जो नादे अली
या अली या अली या अली या अली

वो सदा सुन के बे साख्ता आ गए
जंग लड़ने को मुश्किल कुशा आ गए
जबके बीमार थे मुर्तज़ा आ गए
थे मदीने में पेशे नबी आ गए
गर बुलाये नबी क्यों ना आये वसी
या अली या अली या अली या अली

नाम हैदर का जूं ही नबी ने लिया
जाने कितनो का चेहरा ही मुरझा गया
दिल की हर एक तमन्ना का खूं बह गया
जागना रात भर सब अकारत गया
थी अलम की जो चाहत यूँ ही रह गयी
या अली या अली या अली या अली

लड़ने मरहब से तनहा अली जो गए
सीना पत्थर का चीरा अलम के लिए
बोले हिम्मत हो जिसमें वो आके लड़े
जितने असहाब थे देखते रह गए
एक मरहब की दो लाश कैसे हुई
या अली या अली या अली या अली

एक इशारा अली ने जो दर को किया
दर जो चालीस लोगों से हिलता ना था
ए ज़ुहैर उस इशारे का था मोजिज़ा
दर वो दस्ते दरे इल्म पर आ गया
फिर तो माले गनीमत था और फ़ौज थी
या अली या अली या अली या अली

Matam Ke Roz Khatm Hue Eid Aa Gayi – Eid-e-Zehra

मातम के रोज़ ख़त्म हुए ईद आ गयी
हर मातमी के चेहरे पे मुस्कान छा गयी

तारीकयों से कह दो कहीं और जा बसें
सज्जाद मुस्कुरा दिए रौनक सी आ गयी

लहजे में मुर्तज़ा के जो खुत्बा सुना गयी
फ़र्शे अज़ा यज़ीद के घर में बिछा गयी

बेटी अली की क़स्रे खलीफा गिरा गयी
औक़ात क्या है ज़ुल्म की सबको दिखा गयी

शोले दबा के शाम के ज़िन्दाँ जो आयी थी
क़स्रे यज़ीद सारा का सारा जला गयी

नारा अली का नस्लों का है आइना ए शेख
माथे की एक शिकन कई सदियां दिखा गयी

अजदाद जिनके ग़ार में रोए थे दोस्तों
ज़हरा की ईद आई तो उनको रुला गयी

अम्मा पुकारता है ज़माना उसे ज़ुहैर
जंगे जमल में लड़ने अली से जो आ गयी

Amal Se Kab Wahan Kirdaar Samjha Ja raha hai

अमल से कब वहाँ किरदार समझा जा रहा है
रहज़नो को जहाँ सरदार समझा जा रहा है

नहीं मालूम जिसका हुर है या वो हुरमुला है
भला कैसे वो मातमदार समझा जा रहा है

खुद अपनी कोम को जाहिल दिखा कर सबके आगे
खुद अपने आप को हुशियार समझा जा रहा है

ज़रा सी मालो दौलत और इनकी चापलूसी
ख़याल ए खाम भी हथियार समझा जा रहा है

मेरे माबूद आखिर कब तमाशा ख़त्म होगा
अज़ादारी है क्यों त्योहार समझा जा रहा है

तमाशा करने वालों को खबर दे दो ज़ुहैर अब
ये ना समझें उन्हें दम दार समझा जा रहा है

Yakko tanha jo khada hai kaun ye Sardaar hai?

यक्को तनहा जो खड़ा है कौन ये सरदार है
ज़ालिमों का दिल हिलाती किसकी ये यलगार है

अज़्म इसमें कर्बला का हौसला शब्बीर का
ये अली का शेर है जो बर सर-ए-पैकार है

ओ ज़माने के यज़ीदों है अली इब्ने अली
नाम इसका खामनाई शाह का मातमदार है

बुग़्ज़-ए-हैदर का असर है छुप नहीं सकता कभी
फिर सऊदी कह रहा है जंग-ए-इक़्तेदार है

हैं पचासों मुल्क जिनके हुक्मरां हैं कलमा गो
ज़ुल्म का हामी है जो भी दीन का गद्दार है

दुश्मन-ए-आले नबी जो तू नहीं तो वार कर
चूड़ियां हैं हाथ में या मोम की तलवार है

ज़ुल्म के आगे तो हमने सर झुकाया ही नहीं
कर्बला से आज तक इंकार था इंकार है

लो बहाया जा रहा है फिर से खूने बे-खता
बारिशें अब खून की होंगी यही आसार है

मैं तो अपने मुल्क से भी यही कहता हूं जुहैर
जिस का साया सर पे है वो रेत की दीवार है