Qalam Hasan ne Uthaya hai Karbala ke liyen

ज़मीं पा आया है जो दीन की बक़ा के लिए
जबीं को सजदे में रख्खेगा बस खुदा के लिए

लिखी है सुल्ह फ़क़त या सिफारिश ए क़ासिम
क़लम हसन ने उठाया है कर्बला के लिए

America & Iran War Preparation

आसमाँ का थूका तेरे मुंह पे आने ही लगा
सब ये ज़ाहिर हो रहा है रंग तेरी मात का

इतनी पाबन्दी लगाई थीं भला किस बात की
जब लगा दीं थीं तो फिर ये मारका किस बात का

Jashn-e-Aayat-o-Tafseer

बिगड़ी हुई बनाने को तक़दीर आए हैं
हम लोग सुनने आयत ओ तफ़्सीर आए हैं

ज़ेरे किसा जब आ गया वो नूरे पंजतन
जिब्रील ले के आया ए तत्हीर आए हैं

तरतीब इस तरह से विलादत की बन गयी
पहले बहन तो बाद में शब्बीर आए हैं

Baat Niklegi to Phir Door Talak Jayegi

एक ही खाक को हासिल है शरफ़ सजदों का
जिस पे सजदों से इबादत भी महक जाएगी

ये ना पूछो के भला खाक में रख्खा क्या है
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी

Aise Kaafir Bhi Musalmaan Bane Hain Logon

अपने अंजाम से अनजान बने हैं लोगों
नारे दोज़क का वो सामान बने हैं लोगों

लब पे है नाम ए नबी, दिल में अली से नफरत
ऐसे काफिर भी मुसलमान बने हैं लोगों

Sar Bhi To Na Hamara Idhar Se Udhar Hua

अपनी अक़ीदतों का ये हम पर असर हुआ
गुमराहियों से अपना ना कोई गुज़र हुआ

हमने नबी के दीन को अपनाया इस तरह
सर भी तो ना हमारा इधर से उधर हुआ


मौला की विलायत ने हमें राह दिखाई
गुमराह ख़यालों की ना थी जिसमें रसाई

अपनाया नबी का ही तरीक़ा दिलो जाँ से
हमने तो इबादत में भी गर्दन ना हिलाई

 

Midhat Ali Asghar ki Bas Meri Zaba.an Par Ho

ये ज़िक्र रहे क़ायम जब जब भी जहाँ पर हो
अब जल्द वो मुसल्ला भी आबे रवाँ पर हो

जब पर्दा उठे या रब, और महदी नुमायाँ हों
मिदहत अली असग़र की बस मेरी ज़बाँ पर हो


पैदाइश ए असग़र का मक़सद ही शहादत है
फिर क्यों ना तेरी हैबत ही तीरो कमाँ पर हो

ख़ामोश लबों में भी जब इतना असर है तो
मिदहत अली असग़र की बस मेरी ज़बाँ पर हो

Khadi Ho Kandhe Se Kandha Milaye Zainab Se

बक़ाए मक़सद ए शब्बीर में रहीं शामिल
तुम्हारे लफ्ज़ भी आगे ना आए ज़ैनब से

फ़ज़ीलतों में फ़ज़ीलत जुदा ये है कुलसूम
खड़ी हो काँधे से काँधा मिलाए ज़ैनब से

Zikr e Haider ko aam karte hain

हम जो ज़िक्रे इमाम करते हैं
क़द से ऊँचा ये काम करते हैं

ज़िकरे मौला का फैज़ तो देखो
सिन रसीदा सलाम करते हैं

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क़द से ऊँचा वो काम करते हैं
जो भी ज़िक्रे इमाम करते हैं

उनका सब एहतिराम करते हैं
जो सिना से कलाम करते हैं

दार पर जा के मीसमे तम्मार
ज़िक्रे हैदर को आम करते हैं

आने वाले हैं ग़ैब से मौला
क्या कोई इंतज़ाम करते हैं

मर्सिया नोहा मन्क़बत खानी
आम शह का पयाम करते हैं

नारा हैदर का हम लगा के ज़ुहैर
रुख़ पे मुनकिर के शाम करते हैं