ज़मीं पा आया है जो दीन की बक़ा के लिए
जबीं को सजदे में रख्खेगा बस खुदा के लिए
लिखी है सुल्ह फ़क़त या सिफारिश ए क़ासिम
क़लम हसन ने उठाया है कर्बला के लिए
ज़मीं पा आया है जो दीन की बक़ा के लिए
जबीं को सजदे में रख्खेगा बस खुदा के लिए
लिखी है सुल्ह फ़क़त या सिफारिश ए क़ासिम
क़लम हसन ने उठाया है कर्बला के लिए
आसमाँ का थूका तेरे मुंह पे आने ही लगा
सब ये ज़ाहिर हो रहा है रंग तेरी मात का
इतनी पाबन्दी लगाई थीं भला किस बात की
जब लगा दीं थीं तो फिर ये मारका किस बात का
बिगड़ी हुई बनाने को तक़दीर आए हैं
हम लोग सुनने आयत ओ तफ़्सीर आए हैं
ज़ेरे किसा जब आ गया वो नूरे पंजतन
जिब्रील ले के आया ए तत्हीर आए हैं
तरतीब इस तरह से विलादत की बन गयी
पहले बहन तो बाद में शब्बीर आए हैं
एक ही खाक को हासिल है शरफ़ सजदों का
जिस पे सजदों से इबादत भी महक जाएगी
ये ना पूछो के भला खाक में रख्खा क्या है
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
अपने अंजाम से अनजान बने हैं लोगों
नारे दोज़क का वो सामान बने हैं लोगों
लब पे है नाम ए नबी, दिल में अली से नफरत
ऐसे काफिर भी मुसलमान बने हैं लोगों
अपनी अक़ीदतों का ये हम पर असर हुआ
गुमराहियों से अपना ना कोई गुज़र हुआ
हमने नबी के दीन को अपनाया इस तरह
सर भी तो ना हमारा इधर से उधर हुआ
मौला की विलायत ने हमें राह दिखाई
गुमराह ख़यालों की ना थी जिसमें रसाई
अपनाया नबी का ही तरीक़ा दिलो जाँ से
हमने तो इबादत में भी गर्दन ना हिलाई
अली को लाना है अपने घर में
खुदा का भी एहतिराम क्या है
जो दर नहीं तो दिवार हँस कर
बताएगी के इमाम क्या है
ये ज़िक्र रहे क़ायम जब जब भी जहाँ पर हो
अब जल्द वो मुसल्ला भी आबे रवाँ पर हो
जब पर्दा उठे या रब, और महदी नुमायाँ हों
मिदहत अली असग़र की बस मेरी ज़बाँ पर हो
पैदाइश ए असग़र का मक़सद ही शहादत है
फिर क्यों ना तेरी हैबत ही तीरो कमाँ पर हो
ख़ामोश लबों में भी जब इतना असर है तो
मिदहत अली असग़र की बस मेरी ज़बाँ पर हो
बक़ाए मक़सद ए शब्बीर में रहीं शामिल
तुम्हारे लफ्ज़ भी आगे ना आए ज़ैनब से
फ़ज़ीलतों में फ़ज़ीलत जुदा ये है कुलसूम
खड़ी हो काँधे से काँधा मिलाए ज़ैनब से
हम जो ज़िक्रे इमाम करते हैं
क़द से ऊँचा ये काम करते हैं
ज़िकरे मौला का फैज़ तो देखो
सिन रसीदा सलाम करते हैं
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क़द से ऊँचा वो काम करते हैं
जो भी ज़िक्रे इमाम करते हैं
उनका सब एहतिराम करते हैं
जो सिना से कलाम करते हैं
दार पर जा के मीसमे तम्मार
ज़िक्रे हैदर को आम करते हैं
आने वाले हैं ग़ैब से मौला
क्या कोई इंतज़ाम करते हैं
मर्सिया नोहा मन्क़बत खानी
आम शह का पयाम करते हैं
नारा हैदर का हम लगा के ज़ुहैर
रुख़ पे मुनकिर के शाम करते हैं