Aise Kaafir Bhi Musalmaan Bane Hain Logon

अपने अंजाम से अनजान बने हैं लोगों
नारे दोज़क का वो सामान बने हैं लोगों

लब पे है नाम ए नबी, दिल में अली से नफरत
ऐसे काफिर भी मुसलमान बने हैं लोगों

Sar Bhi To Na Hamara Idhar Se Udhar Hua

अपनी अक़ीदतों का ये हम पर असर हुआ
गुमराहियों से अपना ना कोई गुज़र हुआ

हमने नबी के दीन को अपनाया इस तरह
सर भी तो ना हमारा इधर से उधर हुआ


मौला की विलायत ने हमें राह दिखाई
गुमराह ख़यालों की ना थी जिसमें रसाई

अपनाया नबी का ही तरीक़ा दिलो जाँ से
हमने तो इबादत में भी गर्दन ना हिलाई

 

13 Rajab Ko Kabe Se Elan Ho Gaya

तेरा रजब को काबे से ऐलान हो गया
पैदा जहाँ में काबे का सुलतान हो गया

था इस क़दर अली की मोहब्बत में संग ए बैत
मिस्ले गुलाब खिल के गुलिस्तान हो गया

जो दर बना था काबे में अब तक छुपा नहीं
जब भी छुपाया जिसने परेशान हो गया

हैरत में अक़्ल सजदे में तारीख़ झुक गयी
दस्ते नबी में बोलता क़ुरआन हो गया

जूं ही अली ने झूले में अजदर को दो किया
नाकाम एक लम्हे में शैतान हो गया

किसका लहू नजिस है भला किसका पाक तर
नारा अली का नस्ल की पहचान हो गया

नाते नबी के बाद सना ए अली हुई
मैं क्या कहूं कि हक़ का ये ऐलान हो गया

मौला कहा है मौला अली को नबी ने खुद
बखखिन कहा था खुद ही तू अनजान हो गया

हर एक अपनी क़ब्र में सर फोड़ने लगा
जो भी यहाँ ग़दीर से अंजान हो गया


तेरा रजब को काबे का सम्मान हो गया
आए अली तो काबे का उथ्थान होगया

था इस क़दर अली की मोहब्बत में संग ए बैत
मिस्ले गुलाब काबे का पाशान हो गया

जो दर बना था काबे में अब तक छुपा नहीं
जितना गणित लगा लिया विज्ञान हो गया

जूं ही अली ने झूले में अजदर को दो किया
नाकाम सारा कुफ्र का अभियान हो गया

हैरत में अक़्ल सजदे में तारीख़ झुक गयी
दो दिन का एक सग़ीर जो बलवान हो गया

नाते नबी के बाद सना ए अली हुई
हर लफ्ज़ शेख जी के लिए बान हो गया

किसका लहू नजिस है भला किसका पाक तर
नारे से एक सारा अनूमान हो गया

मौला कहा नबी ने तो ईमान खिल उठा
रोज़े ग़दीर सारा समाधान हो गया

हर एक अपनी क़ब्र में सर फोड़ने लगा
जो भी यहाँ ग़दीर से अज्ञान हो गया

जब आयी ये सदा के लहद से उठो ज़ुहैर
मेरा कफ़न ही मेरा परीधान हो गया

Bas Meri Zaban Par Ho Midhat Ali Asghar Ki

अब कैसे भला होगी मिदहत अली असग़र की
जब फूल चुरा लाए कुदरत अली असग़र की

मुस्कान खुदा तूने फूलों को अता कर दी
बस मेरी ज़बाँ पर हो मिदहत अली असग़र की

शब्बीर सर-ए-मैदाँ बेशीर यूँ लाए हैं
दुनिया को दिखानी थी क़ुदरत अली असग़र की

तलवार नहीं फिर भी असग़र का हुनर देखो
नौ लाख पे छाई है हैबत अली असग़र की

छह माह के सिन में ही ज़ालिम को रुला डाला
क्या होती जवाँ होकर ताक़त अली असग़र की

जब नाम-ए-अली असग़र मैं लब पे सजाता हूँ
साँसों से भी आती है निकहत अली असग़र की

लरज़े में ज़मीं रहती ये ताब ना ला पाती
तनहा जो अगर होती तुरबत अली असग़र की

वो कौन सा बचपन है जो सदियों पे भारी है
छह माह का सिन शह की नुसरत अली असग़र की

वो शक्ल क़सीदे की लेती है ज़ुहैर अक्सर
लबरेज़ हुई जब भी उल्फत अली असग़र की

Abbas E Alamdaar Wafaon Ka Khuda Hai

अब्बास ए अलमदार वफाओं का खुदा है
खुद जिसके लिए दस्त-ए-ख़ुदा, दस्त-ए-दुआ है

जो शेरे खुदा नज़रे खुदा दस्ते खुदा है
अब्बास को पाने के लिए दस्ते दुआ है

शब्बीर की नुसरत में वो हर लम्हा खड़ा है
खत जिसका ही दुश्मन के लिए मिस्ले क़ज़ा है

लश्कर वो जो आँखों में सामाता भी नहीं था
अब्बास की हैबत से वही भाग रहा है

अब पास भी दरिया के कोई आए तो कैसे
अब्बास तराई में अली बनके खड़ा है

था शोर तराई में अजल आ गई भागो
अब्बास तराई में अली बनके खड़ा है

हैरान है खुद तिश्ना-लबी तेरे अमल से
ठोकर में था पानी तू मगर प्यासा लड़ा है

अब तक भी तो बेचैन है दर्याओं का पानी
वो कौन था जो प्यासा इसे छोड़ गया है

जिसने कटे हाथों से है इस्लाम सभाला
वो सारे ज़माने में सकीना का चचा है

मोहताज भी तो आके ग़नी हो गए दर पर
ग़ाज़ी का है दरबार ये दरबार ए अता है

Baqir Jahan Main Aaye to Elaan Ho Gaya

इमरान तेरा जिसको भी इरफ़ान हो गया
वो आदमी हक़ीक़ी मुसलमान हो गया

ये शान भी तो आपके घर को मिली फ़क़त
हर एक बच्चा बोलता क़ुरआन हो गया

दर पाँचवा खुला है इमामत का दोस्तों
बाक़िर जहाँ में आए तो ऐलान हो गया

सज्जाद का ये फ़ैज़ है बाक़िर की शक्ल में
इनका भी इल्म दीन की पहचान हो गया

कब बोलना है, कितना, कहाँ और किस लिए
तब्लीग-ए-हक़ जहान में आसान हो गया

हर्फ़-ओ-बयाँ को नूर मिला फ़िक्र को ज़िया
उल्फत का आगही का भी सामान हो गया

मक़तब खुला तो ज़ुल्म का साया सिमट गया
रौशन हर एक दीन का अरकान हो गया

मैंने ज़ुहैर मदह ओ सना में लिखा जो सब
जब जब पढ़ा है खुद भी मैं हैरान हो गया

Midhat Ali Asghar ki Bas Meri Zaba.an Par Ho

ये ज़िक्र रहे क़ायम जब जब भी जहाँ पर हो
अब जल्द वो मुसल्ला भी आबे रवाँ पर हो

जब पर्दा उठे या रब, और महदी नुमायाँ हों
मिदहत अली असग़र की बस मेरी ज़बाँ पर हो


पैदाइश ए असग़र का मक़सद ही शहादत है
फिर क्यों ना तेरी हैबत ही तीरो कमाँ पर हो

ख़ामोश लबों में भी जब इतना असर है तो
मिदहत अली असग़र की बस मेरी ज़बाँ पर हो

Jahan Bhi Zikr-e-Risalat MaAab Hota Hai

वहीं तो फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा बे-हिसाब होता है
फ़िज़ा में अम्बर ओ मुश्क ओ गुलाब होता है

फ़रिश्ते आके उसी दर पे फख्र करते हैं
जहाँ भी जिक्रे रिसालत मआब होता है

दरे नबी की ग़ुलामी का ये शरफ़ देखो
मलक भी आके यहीं फ़ैज़याब होता है

नबी के रद्दे अमल से ही सीख ले दुनिया
करो जो सब्र तो फिर इंक़लाब होता है

हैं शहर ए इल्म नबी उसका दर अली मौला
बे इज़्न शहर में जाना खराब होता है

लबों पे नाम नबी का दिलों में बुग़ज़े अली
सवाब सारा का सारा अज़ाब होता है

खुदा के बाद नबी हैं नबी के बाद अली
ये याद रखना हिसाबो किताब होता है

ज़ुहैर नाते नबी है, ये बा वज़ू लिखना
हर एक लफ्ज़ भी इसमें गुलाब होता है

Taqve Ne Inke Dar Se Muqaddar Bana Liya

दर पर तक़ी के जिसने भी सर को झुका लिया
बिगड़ी हुई हयात को उसने बना लिया

फ़ज़्ले खुदा से अपना मुक़द्दर जगा लिया
जशने तक़ी में आके क़सीदा सुना लिया

आमद हुई है मौला तक़ी की जहाँ में आज
यानी इमामतों ने नवें दर को पा लिया

बचपन से ही वक़ारे इमामत की शान है
तक़वे ने इनके दर से मुक़द्दर बना लिया

कम सिन थे जब के इल्म ए इमामत के सामने
बातिल के हर सवाल ने मुँह को छुपा लिया

मुट्ठी जो बंद की थी वो खुलना था खुल गई
बातिल ने खुद को खुद से ही रुसवा करा लिया

हर बार आज़माता था मामून इल्म से
हर बार इल्मे मौला तक़ी ने हरा लिया

दरबार में जो इल्म की बातें अयाँ हुई
बातिल खमोश हो गया सर को झुका लिया

इल्मे खुदा का बहता समंदर इमाम हैं
हमने तो मोती रोल लिए तुमने क्या लिया

बाबुल मुराद भी हैं ये जव्वाद भी यही
मैंने दुआ में नाम ए तक़ी बारहा लिया

अकबर अली में जशने तक़ी रात भर हुआ
इश्क़ ए तक़ी की गर्मी ने सबको समा लिया

तुझ पर ज़ुहैर इनकी अता है ये बा खुदा
मिदहत से इनकी लफ्ज़ को मोती बना लिया