बिगड़ी हुई बनाने को तक़दीर आए हैं
हम लोग सुनने आयत ओ तफ़्सीर आए हैं
ज़ेरे किसा जब आ गया वो नूरे पंजतन
जिब्रील ले के आया ए तत्हीर आए हैं
तरतीब इस तरह से विलादत की बन गयी
पहले बहन तो बाद में शब्बीर आए हैं
बिगड़ी हुई बनाने को तक़दीर आए हैं
हम लोग सुनने आयत ओ तफ़्सीर आए हैं
ज़ेरे किसा जब आ गया वो नूरे पंजतन
जिब्रील ले के आया ए तत्हीर आए हैं
तरतीब इस तरह से विलादत की बन गयी
पहले बहन तो बाद में शब्बीर आए हैं
अमीने मक़सद ए शब्बीर हैं ज़ैनब
अली की बोलती तस्वीर हैं ज़ैनब
अली ओ फातिमा शब्बीर ओ शब्बर के
चमकते नूर की तनवीर हैं ज़ैनब
हुर की तरह नसीब को अपने जगा लिया
जिसने दरे हुसैन पा सर को झुका लिया
हमने जो शह का फ़र्शे मसर्रत बिछा लिया
हर एक यज़ीद ज़ादे ने मुँह को छुपा लिया
बे रोक टोक सीधा जहन्नम में जायेगा
जो रास्ता हुसैन से हट कर बना लिया
आग़ोश ए फातिमा में हैं शब्बीर इस तरह
इस्मत ने जैसे गोद में क़ुरआन उठा लिया
फितरुस को बालो पर भी मिले ज़िन्दगी मिली
झूले से उसने ख़ुद को ज़रा-सा मिला लिया
ज़ालिम की पूरी फ़ौज ही सकते में आ गयी
रन में ज़रा सग़ीर यूँ ही मुस्कुरा लिया
मुस्कान से ही फ़ौज में सब खलबली सी है
क्या होगा गर सग़ीर ने नेज़ा उठा लिया
जाऊं ना में पलट के यही आरज़ू रही
इक बार जिसने रोज़े का दीदार पा लिया
मंज़र जो कर्बला के मयस्सर हुए हमें
नज़रों के रास्ते उन्हें दिल में बसा लिया
नज़रों से अपनी रोका था लश्कर दिलेर ने
तुमसे हटेंगे खेमें भला सोच क्या लिया
इस पार आ गया तो वो उस पार जायेगा
जिसने भी एक क़दम मेरे खत से बढ़ा लिया
हम पर ज़ुहैर फातिमा ज़ेहरा की है अता
हमने तो अपना अश्क भी मोती बना लिया
दिन-रात की गर्दिश ने बताया के ख़ुदा है
हर साँस ने हर बार जताया के ख़ुदा है
जब बाद ए सहर गाने लगी रब का तराना
चिड़ियों ने चहक कर वो सुनाया के ख़ुदा है
सेहरा ने कभी लू ने तो सूरज की तपिश ने
हर शाम ने एहसास कराया के खुदा है
बे इज़्न ए खुदा हिलते नहीं पेडों के पत्ते
मौसम ने बदल कर ये दिखाया के ख़ुदा है
हर फर्द से हर फर्द जुदा रंग जुदा है
पर एक सी धड़कन ने बताया के खुदा है
हर जिस्म हर इक रूह अमानत है खुदा की
दोनों ने अलग होके दिखाया के खुदा है
झलकी ही सही तूर पे ज़ाहिर तो हुआ था
मूसा ने तजल्ली में ये पाया के खुदा है
ख़ालिक़ को उठाना पड़ा तब अर्श के ऊपर
जब ईसा को कहने लगी दुनिया के खुदा है
आए हैं सवा लाख नबी ये ही बताने
ये प्यारे मोहम्मद ने सिखाया के खुदा है
पैकर से नबी के भी हक़ीक़त ये अयाँ है
बस जिस्म ज़मीं पर है, ना साया के खुदा है
सदियों का सफर लम्हों में कर आए मोहम्मद
मेराज ने अहमद की बताया के खुदा है
लो आमद ए हैदर के लिए खिल गए पत्थर
दीवार ने काबे की दिखाया के खुदा है
काबे में विलादत हुई आते ही अली ने
आग़ोश-ए-मुहम्मद में सुनाया के ख़ुदा है
कहते थे अली बर सरे मिम्बर जो सलूनी
दावा ए सलूनी था ये दावा के खुदा है
रिश्ता लिए ज़ेहरा से अली का वो सितारा
दहलीज़ पे आकर ये पुकारा के खुदा है
आए जो हसन सारा ज़माना हुआ शाहिद
किरदार में उनके नज़र आया के खुदा है
शब्बीर ने तौहीद बचाई है लहू से
सर दे दिया पर सर ना झुकाया के खुदा है
है कोई जो हक़ बात पे सर देने को आए
अकबर ने अज़ाँ देके बुलाया के खुदा है
जब गर्द ए सितम दिल से हटी ज़ेहन पुकारा
हुर छोड़ के बातिल इधर आया के खुदा है
वो सिर्फ चरागों का बुझाना तो नहीं था
सर्वर ने अंधेरों को जगाया के खुदा है
असग़र भी बताने को ये ही आ गए रन में
मुस्कान को होठों पे सजाया के खुदा है
हक़ बात पे सर देना फ़रीज़ा है हमारा
सर सजदे में सर्वर ने झुकाया के खुदा है
मेहदी की ये ग़ैबत भी हकीकत है खुदा की
हर राज़ से उठ जायेगा पर्दा के खुदा है
तौहीद भला कैसे लिखी जाए ज़ुहैर अब
अल्फ़ाज़ ने फिर साथ निभाया के खुदा है
एक ही खाक को हासिल है शरफ़ सजदों का
जिस पे सजदों से इबादत भी महक जाएगी
ये ना पूछो के भला खाक में रख्खा क्या है
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
अपने अंजाम से अनजान बने हैं लोगों
नारे दोज़क का वो सामान बने हैं लोगों
लब पे है नाम ए नबी, दिल में अली से नफरत
ऐसे काफिर भी मुसलमान बने हैं लोगों
अपनी अक़ीदतों का ये हम पर असर हुआ
गुमराहियों से अपना ना कोई गुज़र हुआ
हमने नबी के दीन को अपनाया इस तरह
सर भी तो ना हमारा इधर से उधर हुआ
मौला की विलायत ने हमें राह दिखाई
गुमराह ख़यालों की ना थी जिसमें रसाई
अपनाया नबी का ही तरीक़ा दिलो जाँ से
हमने तो इबादत में भी गर्दन ना हिलाई
अली को लाना है अपने घर में
खुदा का भी एहतिराम क्या है
जो दर नहीं तो दिवार हँस कर
बताएगी के इमाम क्या है
तेरा रजब को काबे से ऐलान हो गया
पैदा जहाँ में काबे का सुलतान हो गया
था इस क़दर अली की मोहब्बत में संग ए बैत
मिस्ले गुलाब खिल के गुलिस्तान हो गया
जो दर बना था काबे में अब तक छुपा नहीं
जब भी छुपाया जिसने परेशान हो गया
हैरत में अक़्ल सजदे में तारीख़ झुक गयी
दस्ते नबी में बोलता क़ुरआन हो गया
जूं ही अली ने झूले में अजदर को दो किया
नाकाम एक लम्हे में शैतान हो गया
किसका लहू नजिस है भला किसका पाक तर
नारा अली का नस्ल की पहचान हो गया
नाते नबी के बाद सना ए अली हुई
मैं क्या कहूं कि हक़ का ये ऐलान हो गया
मौला कहा है मौला अली को नबी ने खुद
बखखिन कहा था खुद ही तू अनजान हो गया
हर एक अपनी क़ब्र में सर फोड़ने लगा
जो भी यहाँ ग़दीर से अंजान हो गया
तेरा रजब को काबे का सम्मान हो गया
आए अली तो काबे का उथ्थान होगया
था इस क़दर अली की मोहब्बत में संग ए बैत
मिस्ले गुलाब काबे का पाशान हो गया
जो दर बना था काबे में अब तक छुपा नहीं
जितना गणित लगा लिया विज्ञान हो गया
जूं ही अली ने झूले में अजदर को दो किया
नाकाम सारा कुफ्र का अभियान हो गया
हैरत में अक़्ल सजदे में तारीख़ झुक गयी
दो दिन का एक सग़ीर जो बलवान हो गया
नाते नबी के बाद सना ए अली हुई
हर लफ्ज़ शेख जी के लिए बान हो गया
किसका लहू नजिस है भला किसका पाक तर
नारे से एक सारा अनूमान हो गया
मौला कहा नबी ने तो ईमान खिल उठा
रोज़े ग़दीर सारा समाधान हो गया
हर एक अपनी क़ब्र में सर फोड़ने लगा
जो भी यहाँ ग़दीर से अज्ञान हो गया
जब आयी ये सदा के लहद से उठो ज़ुहैर
मेरा कफ़न ही मेरा परीधान हो गया
अब कैसे भला होगी मिदहत अली असग़र की
जब फूल चुरा लाए कुदरत अली असग़र की
मुस्कान खुदा तूने फूलों को अता कर दी
बस मेरी ज़बाँ पर हो मिदहत अली असग़र की
शब्बीर सर-ए-मैदाँ बेशीर यूँ लाए हैं
दुनिया को दिखानी थी क़ुदरत अली असग़र की
तलवार नहीं फिर भी असग़र का हुनर देखो
नौ लाख पे छाई है हैबत अली असग़र की
छह माह के सिन में ही ज़ालिम को रुला डाला
क्या होती जवाँ होकर ताक़त अली असग़र की
जब नाम-ए-अली असग़र मैं लब पे सजाता हूँ
साँसों से भी आती है निकहत अली असग़र की
लरज़े में ज़मीं रहती ये ताब ना ला पाती
तनहा जो अगर होती तुरबत अली असग़र की
वो कौन सा बचपन है जो सदियों पे भारी है
छह माह का सिन शह की नुसरत अली असग़र की
वो शक्ल क़सीदे की लेती है ज़ुहैर अक्सर
लबरेज़ हुई जब भी उल्फत अली असग़र की