Hasan Noor-e-Khuda Ki Raushni hai

नबी से इश्क़ ओ उल्फत, आगही है
नबी पर जान देना, ज़िन्दगी है
नबी का हर अमल, रब की वही है
नहीं इनकी नहीं, रब की नहीं है

नबी का जा नशी वाहिद अली है
अली जैसा नहीं कोई नहीं है

अली हर हाल में हक़ का वली है
अली के नाम से मुश्किल टली है
अली ने तो मदद नबियों की की है
अली का ज़िक्र रब की बंदगी है

अली जिसको समझ आता नहीं है
खता ये माँ की है उसकी नहीं है

मेरी माँ ने मुझे ये सीख दी है
नहीं दिल में अली तो तीरगी है
सहारा बे सहारों का अली है
हर एक ग़म की दवा नादे अली है

बशर गिरते हुआ गिरता नहीं है
कहा बेसाख्ता जब या अली है

मदीने में ये ही होता था अक्सर
नबी को लोग कुछ कहते थे अब्तर
ये ताना बार था अहमद के दिल पर
लिए मायूस दिल आये जो घर पर

कहा ख़ालिक़ ने ए जिब्रील जाओ
मेरे मेहबूब को कौसर सुनाओ

लिए जिब्रील कौसर आए दर पर
कहा मायूस ना हों ए पयम्बर
खुदा ने आपको भेजा है कौसर
कहा जिसने रहेगा वो ही अब्तर

नबूअत जो खतम तुम पर करुंगा
तुम्हारे लाल मैं ज़ेहरा को दूँगा

वो ज़ेहरा जो के है उम्मे अबीहा
है सर पर ताज ख़ातूने जिना का
नबी की नस्ल को जिसने चलाया
जहाँ में नाम है दो लाडलों का

इमामत इनके आँगन में पली है
विलायत जिनसे दुनिया को मिली है

हसन जाने अली सिब्ते नबी है
हसन खुद भी वली इब्ने वली है
हसन जैसा किसी का हुस्न भी है
हसन नूर ए खुदा की रौशनी है

मलक इनके ही दर पर आ रहे हैं
लिबास ए खुल्द ये मँगवा रहे हैं

हसन ने सुल्ह कर के दीं बचाया
किया वो वार कुछ भी बच ना पाया
अमीर ए शाम को क़ैदी बनाया
क़लम की नोक से यूँ सर उड़ाया

ज़ुहैर इस सुल्ह की हिकमत यही है
सितम का धड़ कहीं गर्दन कहीं है


हसन कुल आयत ए रब्बे जली है
हसन को याद करना बंदगी है

हसन नूर-ए-ख़ुदा की रौशनी है
हसन सब्र-ओ-वफ़ा की ज़िन्दगी है

हसन जो फातिमा का दिल नशीं हैं
हसन जान ए दिल ए मौला अली है

नबी गोदी में लेकर देखते हैं
हसन में किस क़दर की दिलकशी है

ना करना जंग ये बतला रहा है
हसन की राह अम्न-ओ-आश्ती है

है हिकमत और अमल दोनों बराबर
हसन की सुल्ह भी सुल्ह ए नबी है

नक़्शे पा इनकी सखावत का चलन है
हसन खुद भी सखी इब्ने सखी है

सभी सुन ले ये आशिक़ माविया के
सुलह को तोड़ देना बुज़दिली है

ज़ुहैर इस सुल्ह की हिकमत यही है
सितम का धड़ कहीं गर्दन कहीं है

Yun to Jalva Dekhte hain, Roo ba Roo Dekha Nahi

ज़िक्र-ए-अहले बैत जिनको एक नज़र भाता नहीं
नूर-ए-हक़ का उन अंधेरों से कोई रिश्ता नहीं

डर तुझे किस बात का है क्यों भला कहता नहीं
तू फ़ज़ाइल मुर्तज़ा के खोल कर पढता नहीं

अपनी मर्ज़ी बेच दी ख़ालिक़ ने सोने के एवज़
और मर्ज़ी मोल लेकर भी अली मौला नहीं

गर ना होती मर्ज़ी ए रब मुर्तज़ा के हाथ में
फिर नुसैरी भी अली को यूँ खुदा कहता नहीं

गर अली दिल में समां जाए तो ये देखा गया
दार से मदह-ओ-सना करके बशर मरता नहीं

बे विला तो जो भी हो वो हर अमल बेकार है
हज कहाँ फिर हज रहा उमरा भी तो उमरा नहीं

परदे-ए-ग़ैबत से भी वो नूर-ए-हक़ ज़ौ-बार है
यूँ तो जलवे देखते हैं, रूबरू देखा नहीं

खून ए हैदर दिख रहा है आज तक मेहराब में
मस्जिदों में बम धमाके आज का मसला नहीं

ये ख़बर दे दो यज़ीदान-ए-जहाँ को भी ज़ुहैर
बम धमाकों से भी अपना हौसला झुकता नहीं

Zulmaten Sab Door Hongi Aur Ujale Aayenge

देख लेना के मुनाफ़िक़ ख़ुद-ब-ख़ुद मर जाएँगे
बद नसब तो नारा ए हैदर से ही डर जाएँगे
और ज़ालिम नस्ल के पत्ते तलक गिर जाएँगे
क़ायम-ए-आल-ए-मुहम्मद ग़ैब से जब आएँगे
ज़ुल्मतें सब दूर होंगी और उजाले आएँगे

अपने जद सा अद्ल लेकर आएँगे मेरे इमाम
सारी दुनिया देख लेगी फिर से हैदर का निज़ाम
बहर ए हक़ महदी करेंगे हक़ का सारा इंतज़ाम
क़हर बनकर ज़ुल्म पर जब वो अदालत लाएँगे
ज़ुल्मतें सब दूर होंगी और उजाले आएँगे

अंबिया आकर खड़े होंगे वहाँ पर सफ़-ब-सफ़
सबसे पहले ख़ाना-ए-हक़ को मिलेगी ये शरफ़
नूर-ए-हक़ दुनिया में फैलेगा यहीं से हर तरफ़
ख़ाना-ए-काबा की छत पर जब अलम लहराएँगे
ज़ुल्मतें सब दूर होंगी और उजाले आएँगे

या इलाही कर अता इस बे-क़रारी को क़रार
ख़त्म कर दे आख़री हुज्जत का अब तो इंतज़ार
ख़ून की प्यासी है सदियों से अली की ज़ुल्फ़िकार
ख़ौफ़ के साए मिटेंगे, हौसले बढ़ जाएँगे
ज़ुल्मतें सब दूर होंगी और उजाले आएँगे

रह के परदे में हमारी हर ख़बर रखता है जो
जो ख़यालों में बसा है, दिल में भी गहरा है जो
वो रुख़-ए-अनवर दिखा दे, यूसुफ़-ए-ज़हरा है जो
रौज़ा-ए-मिस्मार पर फिर से बहारें लाएँगे
ज़ुल्मतें सब दूर होंगी और उजाले आएँगे

है दुआ इतनी के जब तक दम में दम होगा ज़ुहैर
नुसरत-ए-हुज्जत का जज़्बा कम नहीं होगा ज़ुहैर
मर गए जो हम तो फिर हम पर करम होगा ज़ुहैर
क़ब्र से हमको उठाने ख़ुद फ़रिश्ते आएँगे
ज़ुल्मतें सब दूर होंगी और उजाले आएँगे

Ali Akbar Main Husn-e-Ahmad-e-Mukhtaar Milta Hai

शबीह-ए-मुस्तफ़ा का ये निराला वार मिलता है
सितम का सारा लश्कर सरहदों से पार मिलता है

बहत्तर कोशिशे कर ली बहत्तर बार हारा है
सितम हैरान है हर बार ही इंकार मिलता है

अली वाले का दुनिया में ये ही किरदार मिलता है
नई मिदहत सुनाता है उसे जब दार मिलता है

भले सूली चढ़ाए या हमारी जान ही ले ले
क़लम कर दे ज़बाँ फिर भी, उसे इंकार मिलता है

वो असग़र हों या अकबर हों या फिर इब्ने मज़ाहिर हों
अलग हर सिन में नुसरत का वही मेयार मिलता है

अगर साया ना होता तो मुकम्मल मुस्तफा होते
अली अकबर में हुस्ने अहमद ए मुख़्तार मिलता है

अज़ान ए सुबह ए आशूरा ये कहती ज़ुहैर हमसे
शऊर ए हक़ जो रखता है वो ही बेदार मिलता है

America & Iran War Preparation

आसमाँ का थूका तेरे मुंह पे आने ही लगा
सब ये ज़ाहिर हो रहा है रंग तेरी मात का

इतनी पाबन्दी लगाई थीं भला किस बात की
जब लगा दीं थीं तो फिर ये मारका किस बात का

Aasiya Ke Hathon Pe Jo Hina Ki Lali Hai (Moh. Bagla Arshiya ki padosn)

आसिया के हाथों पे जो हिना की लाली है
नाज़िया ये कहती हैं हर अदा निराली है

नूर और नज़र दोनों इस ख़ुशी से रोते हैं
चेहरे पर ख़ुशी चमके आँखों में भी लाली है
आसिया के हाथों पे जो हिना की लाली है
नाज़िया ये कहती हैं हर अदा निराली है

दादा आज जन्नत से देखते हैं दुल्हन को
दादी की दुआओं ने क़िस्मतें सँवारी है
आसिया के हाथों पे जो हिना की लाली है
नाज़िया ये कहती हैं हर अदा निराली है

ताए ताई दुल्हन के सर पा हाथ रखते हैं
चाचा चाची दोनों ने खूब ही दुआ दी है
आसिया के हाथों पे जो हिना की लाली है
नाज़िया ये कहती हैं हर अदा निराली है

नानी आज जन्नत से ये नज़ारा करती हैं
नाना जान की गुड़िया आज कितनी प्यारी है
आसिया के हाथों पे जो हिना की लाली है
नाज़िया ये कहती हैं हर अदा निराली है

मामा मामी सबकी ही साथ में दुआएँ हैं
आज उनकी प्यारी की शादी होने वाली है
आसिया के हाथों पे जो हिना की लाली है
नाज़िया ये कहती हैं हर अदा निराली है

ख़ाला ख़ालू कहते हैं कि नसीब रोशन हो
आसिया की शादी की हर अदा निराली है
आसिया के हाथों पे जो हिना की लाली है
नाज़िया ये कहती हैं हर अदा निराली है

भाई बहने सब हँस कर रस्मों को निभाते हैं
नग़्मों की शरारत है और ख़ुशी की ताली है
आसिया के हाथों पे जो हिना की लाली है
नाज़िया ये कहती हैं हर अदा निराली है

Awwal Tumhen Aana Hai, Aakhir Tumhen Aana Hai

आला ये घराना था, आला ये घराना है
हर दौर ने माना था, हर दौर ने माना है

परदे में अभी क़ायम अहमद की निशानी है
रौशन वो ज़माना था, रौशन ये ज़माना है

है कैसा मुसलमां वो, पढ़ता है नमाज़ें तो
अहमद की ना माना था, हैदर को ना माना है

जिब्रील हों, काबा हो, मस्जिद हो या मिम्बर हो
हैदर का दिवाना था हैदर का दिवाना है

अव्वल तुम्हें आना है, आखिर तुम्हें आना है
कल कलमा पढ़ाया था, अब पर्दा उठाना है

तौहीद बताने को फिर उसको बचाने को
अव्वल तुम्हें आना है आखिर तुम्हें आना है

मजलिस का तबर्रुक हो, अश्क-ए-ग़म-ए-सर्वर हो
अनमोल खज़ाना था अनमोल खज़ाना है

ज़हरा ओ अली, शब्बर-शब्बीर के क़ातिल का
अंदाज़ ज़नाना था अंदाज़ ज़नाना है

आपस में लड़ाए वो, या बाग़े फ़िदक लूटे
दोज़ख में ही जाना था दोज़ख में ही जाना है

ये काम बड़े लेकर आये हैं अली असग़र
बैअत को हराना था, ज़ालिम को रुलाना है

हर दौर के मरजा पर, या फ़र्श-ए-ग़म-ए-शह पर
ज़ालिम का निशाना था ज़ालिम का निशाना है

क्यों उनको बुलाना है आना ही नहीं जिनको
कल कोई बहाना था अब कोई बहाना है

हर दौर में ये सबकी नस्लों का पता देगा
खैबर में जो पाया था, नारा वो लगाना है

कहता है ज़ुहैर अब भी ग़ाज़ी का अलम हमसे
सर को ना झुकाया था सर को ना झुकाना है

Shah Ka Gham Farshe Aza Zaiban Ka Tha Zainab Ka Hai

शह का ग़म फ़र्शे अज़ा ज़ैनब का था ज़ैनब का है
हश्र तक ये सिलसिला ज़ैनब का था ज़ैनब का है

बाप की ज़ीनत है और मक़सद ए शह की अमीन
मर्तबा ये बा खुदा ज़ैनब का था ज़ैनब का है

काम जिसने ले लिया शमशीर का तक़रीर से
क़ैद में वो हौसला ज़ैनब का था ज़ैनब का है

मुफ्तिए बिदअत तेरे फतवों ने ज़ाहिर कर दिया
खौफ तारी ज़ुल्म पा ज़ैनब का था ज़ैनब का है

हक़ परस्ती, शह का मक़सद, कर्बला से खुल्द तक
इस सफर का रास्ता ज़ैनब का था ज़ैनब का है

मदह खानी शह का मातम जज़्बा ए नुसरत ज़ुहैर
जो करम तुझ पर हुआ ज़ैनब का था ज़ैनब का है

Jashn-e-Aayat-o-Tafseer

बिगड़ी हुई बनाने को तक़दीर आए हैं
हम लोग सुनने आयत ओ तफ़्सीर आए हैं

ज़ेरे किसा जब आ गया वो नूरे पंजतन
जिब्रील ले के आया ए तत्हीर आए हैं

तरतीब इस तरह से विलादत की बन गयी
पहले बहन तो बाद में शब्बीर आए हैं

Ameen e Maqsad e Shabber hain Zainab

अमीने मक़सद ए शब्बीर हैं ज़ैनब
अली की बोलती तस्वीर हैं ज़ैनब

अली ओ फातिमा शब्बीर ओ शब्बर के
चमकते नूर की तनवीर हैं ज़ैनब