बक़ाए मक़सद ए शब्बीर में रहीं शामिल
तुम्हारे लफ्ज़ भी आगे ना आए ज़ैनब से
फ़ज़ीलतों में फ़ज़ीलत जुदा ये है कुलसूम
खड़ी हो काँधे से काँधा मिलाए ज़ैनब से
बक़ाए मक़सद ए शब्बीर में रहीं शामिल
तुम्हारे लफ्ज़ भी आगे ना आए ज़ैनब से
फ़ज़ीलतों में फ़ज़ीलत जुदा ये है कुलसूम
खड़ी हो काँधे से काँधा मिलाए ज़ैनब से
हर जशने सादिक़ ऐन में ये भी अजब मिला
जो शख्स भी मिला वो हमें बा अदब मिला
उल्फत खुदा की दीन भी दुनिया का इल्म भी
बाक़िर के लाल आपके दर से ये सब मिला
इल्मो अमल में आप का सानी कोई नहीं
जाफर है नाम आपको सादिक़ लक़ब मिला
इस दर पे मांगने की ज़रूरत नहीं पड़ी
जो आ गया यहाँ पे उसे बे तलब मिला
मुनकिर जो इनके दर का मिले उस से पूछना
कितना मिला कहाँ से मिला और कब मिला
मिदहत ज़ुहैर इनकी बराए सवाब कर
सदक़ा है इनके दर का तुम्हें खुश लक़ब मिला
या नबी या नबी या नबी या नबी
या नबी या नबी या नबी या नबी
या नबी या नबी या नबी या नबी
या नबी या नबी या नबी या नबी
ये फलक ये ज़मीं चाँद सूरज सभी
ये समंदर ये तारों में सब रौशनी
सारी दुनिया तुम्हारे लिए है सजी
या नबी या नबी या नबी या नबी
आके दुनिया में रौशन जहाँ कर दिया
खाली दामन जो था इल्म से भर दिया
तुम जो आये तो पहचान रब की हुई
या नबी या नबी या नबी या नबी
कोई छोटा नहीं ना कोई है बड़ा
सबसे आला है कोई तो वो है खुदा
तुमसे सीखी तो आयी हमें बंदगी
या नबी या नबी या नबी या नबी
तुमको ताहा कहा और यासीन भी
मिलने तुमको बुलाया वो मेराज दी
फातिमा जैसी बेटी भी तुमको मिली
या नबी या नबी या नबी या नबी
एक इशारे से जिसने क़मर दो किया
उसको लोगो ने अपने ही जैसा कहा
कौन कर पायेगा आपकी हमसरी
या नबी या नबी या नबी या नबी
कितनी मोजिज़ नुमा आपकी ज़ात है
मुँह है छोटा ज़ुहैर और बड़ी बात है
मैं कहाँ और कहाँ आपकी नौकरी
या नबी या नबी या नबी या नबी
या अली या अली या अली या अली
या अली या अली या अली या अली
या अली या अली या अली या अली
मेरा मौला अली मेरा आक़ा अली
आसमानो ज़मीं पर हुकूमत तेरी
दिन तेरी रौशनी रात मर्ज़ी तेरी
हर सितारों ने की है तेरी नौकरी
तेर सदक़े में नबियों की मुश्किल टली
या अली या अली या अली या अली
मैंने खैबर से जब पूँछा ये माजरा
जंग में क्या हुआ कुछ बता तो ज़रा
जब ना थे मुर्तज़ा तो लड़ा कौन था
इतने दिन क्यों लगे क्यों फतह ना हुआ
किसको खैबर में अहमद ने आवाज़ दी
या अली या अली या अली या अली
बोला खैबर के अल मुख़्तसर यूँ हुआ
जंगे का सारा नक़्शा था पलटा हुआ
लड़ने मरहब से कोई भी जाता ना था
लड़ने जाता था कोई तो टिकता ना था
एक भी तो ना था सब में कोई जरी
या अली या अली या अली या अली
सूरमा सब बने मात खाते रहे
झंडे जाते रहे डंडे आते रहे
मात खाते रहे मुँह छुपाते रहे
अपनी ना कामियां सब सुनाते रहे
मर्दे मैदाँ तो उनमे ना निकला कोई
या अली या अली या अली या अली
कितने असहाब थे सब बड़े से बड़े
सबसे आगे थे वो जो ससुर भी हुए
लड़ने वो भी गए थे बड़ी शान से
पहुँचे थे शान से पलटे हैरान से
बे ज़ुबाँ को सुनाने लगे जो खरी
या अली या अली या अली या अली
कितने हज़रात का आना जाना हुआ
ख़त्म हर एक का हर बहाना हुआ
दिन गुज़रते रहे एक ज़माना हुआ
पर खुदा ने था कुछ और ठाना हुआ
आए जिब्रील ले कर वहीं पर वही
या अली या अली या अली या अली
बोले अहमद अलम अब मैं दूँगा उसे
गैर ए फर्रार हो जीत हासिल करे
कितने अलक़ाब थे जो नबी ने कहे
एक लक़ब में भी हमसर ना छोटे बड़े
दिन वो ढलने लगा रात होने लगी
या अली या अली या अली या अली
उफ़ अलम की वो चाहत थी असहाब में
नींद सबकी उडी थी अलम के लियें
नींद कैसी खुली आँखों से खाब में
सोचते थे अलम कल मिलेगा हमें
सोचते सोचते ही सुबह हो गयी
या अली या अली या अली या अली
दिन जो निकला अज़ाने सहर जो हुई
तेज़ धड़कन जो थी तेज़ तर हो गयीं
हम को देंगे अलम बस गुमां था यही
जिस से डरते थे आखिर हुआ फिर वही
मुस्तफा ने पढ़ी फिर जो नादे अली
या अली या अली या अली या अली
वो सदा सुन के बे साख्ता आ गए
जंग लड़ने को मुश्किल कुशा आ गए
जबके बीमार थे मुर्तज़ा आ गए
थे मदीने में पेशे नबी आ गए
गर बुलाये नबी क्यों ना आये वसी
या अली या अली या अली या अली
नाम हैदर का जूं ही नबी ने लिया
जाने कितनो का चेहरा ही मुरझा गया
दिल की हर एक तमन्ना का खूं बह गया
जागना रात भर सब अकारत गया
थी अलम की जो चाहत यूँ ही रह गयी
या अली या अली या अली या अली
लड़ने मरहब से तनहा अली जो गए
सीना पत्थर का चीरा अलम के लिए
बोले हिम्मत हो जिसमें वो आके लड़े
जितने असहाब थे देखते रह गए
एक मरहब की दो लाश कैसे हुई
या अली या अली या अली या अली
एक इशारा अली ने जो दर को किया
दर जो चालीस लोगों से हिलता ना था
ए ज़ुहैर उस इशारे का था मोजिज़ा
दर वो दस्ते दरे इल्म पर आ गया
फिर तो माले गनीमत था और फ़ौज थी
या अली या अली या अली या अली
मातम के रोज़ ख़त्म हुए ईद आ गयी
हर मातमी के चेहरे पे मुस्कान छा गयी
तारीकयों से कह दो कहीं और जा बसें
सज्जाद मुस्कुरा दिए रौनक सी आ गयी
लहजे में मुर्तज़ा के जो खुत्बा सुना गयी
फ़र्शे अज़ा यज़ीद के घर में बिछा गयी
बेटी अली की क़स्रे खलीफा गिरा गयी
औक़ात क्या है ज़ुल्म की सबको दिखा गयी
शोले दबा के शाम के ज़िन्दाँ जो आयी थी
क़स्रे यज़ीद सारा का सारा जला गयी
नारा अली का नस्लों का है आइना ए शेख
माथे की एक शिकन कई सदियां दिखा गयी
अजदाद जिनके ग़ार में रोए थे दोस्तों
ज़हरा की ईद आई तो उनको रुला गयी
अम्मा पुकारता है ज़माना उसे ज़ुहैर
जंगे जमल में लड़ने अली से जो आ गयी
अज़ा ए शह को ही बस अपना हम सफर रखना
नजफ़ से हो जो शुरू ऐसी रह गुज़र रखना
सलाम करना शहीदों को और असीरों को
सफर में अपने क़दम तुम जिधर जिधर रखना
सफर हो हुज्जते आखिर के साथ में अपना
इलाही मेरी दुआओं में वो असर रखना
सना जो करना हो अब्बास की तो याद रहे
तुम अपने ज़ेर भी अशआर में ज़बर रखना
हो जब भी ज़िक्र कहीं प्यास का मुसीबत का
तो खुल के रोने रुलाने में ना कसर रखना
सकीना कहती थी जब शाहे दीं चले रन को
हुई जो शाम तो बाबा मेरी खबर रखना
कहा ये शह ने सकीना कटेगा सर मेरा
पड़ा मिले मेरा लाशा तो अपना सर रखना
जलेगा आग से दामन तेरा मेरी दिलबर
जो छीने बालियाँ कोई तो तुम सबर रखना
ज़ुहैर तुमको ज़माना अगर सताने लगे
असीरे शाम की ग़ुरबत पा भी नज़र रखना
अमल से कब वहाँ किरदार समझा जा रहा है
रहज़नो को जहाँ सरदार समझा जा रहा है
नहीं मालूम जिसका हुर है या वो हुरमुला है
भला कैसे वो मातमदार समझा जा रहा है
खुद अपनी कोम को जाहिल दिखा कर सबके आगे
खुद अपने आप को हुशियार समझा जा रहा है
ज़रा सी मालो दौलत और इनकी चापलूसी
ख़याल ए खाम भी हथियार समझा जा रहा है
मेरे माबूद आखिर कब तमाशा ख़त्म होगा
अज़ादारी है क्यों त्योहार समझा जा रहा है
तमाशा करने वालों को खबर दे दो ज़ुहैर अब
ये ना समझें उन्हें दम दार समझा जा रहा है
रिहाई जो क़ैद ए सितम से मिलेगी तो पहले ग़मे शह मनाएगी ज़ैनब
नहीं रो सकी है ये भाई को अपने ज़रा खुल के आँसू बहायेगी ज़ैनब
ना चादर थी बाक़ी ना बाज़ू खुले थे जो मातम ये भाई का करती तो कैसे
मिलेगी रिहाई जो ज़ुल्मो सितम से तो फ़र्शे ग़मे शह बिछाएगी ज़ैनब
मदीने से पहले ये दश्ते बला में शहीदों के मरक़द पे आहो फ़ुग़ाँ में
जो ज़िन्दाँ में गुज़रे हैं रंजो मसायब शहे कर्बला को सुनाएगी ज़ैनब
वो माटी के बिस्तर पे बच्चों का सोना सकीना का रोना तुम्हारा ना होना
ये ही सोचती थी अँधेरे में तनहा भला इसको कैसे सुलाएगी ज़ैनब
नहीं सो सकी थी जुदा होके तुमसे वो ज़िन्दाँ में सोती है बच्ची तुम्हारी
सुला आयी उसको अँधेरे मकां में भला किस तरह ये बताएगी ज़ैनब
सितम ज़ालिमों के ना सह पाई बच्ची जुदा होके तुमसे ना रह पाई बच्ची
जगाया बहुत मैंने भाई ये कह कर तुम्हारे बिना कैसे जायेगी ज़ैनब
हमें ज़ालिमों ने सताया है भाई बे मखना बे चादर फिराया है भाई
बचाया है दीं तुमने अपने लहु से तुम्हारी शहादत बचाएगी ज़ैनब
है सैलाब सीने में भाई के ग़म का मुसीबत का फुरक़त का रंजो अलम का
कहीं छुप ना जाए शहे दीं का क़ातिल अज़ाख़ाना पहले बनाएगी ज़ैनब
ये फ़र्शे अज़ा यूँ ही बिछती रहेगी सितम ज़ालिमों के ये सबसे कहेगी
ज़ुहैर अपनी आँखों से आँसु बहाओ नक़ाबें सितम की उठाएगी ज़ैनब
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है
किस जा तुझे ढूंढेगी परेशान ये माँ है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है
सेहरा है बियाबान है दिल रोता है असगर
सब जंग के सामान हैं पुर हौल समाँ है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है
सुनती हूं के मैदान में तीरों से लड़ा है
छः माह का बच्चा वो मेरा तश्ना दहाँ है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है
क्या लाल मेरे भाई से मिलने को गए हो
हमशक्ल ए पयंबर के भी सीने में सिना है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है
खेमों को जलाया तेरा झूला भी जलाया
दिखता नहीं कुछ भी मेरी आँखों में धुआँ है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है
ता हश्र सदा साथ रहेगी ये आलम के
इस मश्क ए सकीना में अलमदार की जाँ है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है
पानी लिए कूज़े में बहन ढूंढ रही है
खुद प्यासी है कहती है मेरा भाई कहाँ है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है
रोते हैं शब्बो रोज़ परिंदे तुम्हें असग़र
ये गिरया कुनाँ ग़म में तेरे इनकी ज़बाँ है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है
एक माँ की मुसीबत को बयान कैसे करे हम
सैलाब सा हर फ़र्द की आँखों से रवाँ है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है
कुछ डर नहीं मरक़द के अँधेरों का ज़ुहैर अब
रौशन मेरे सीने पे जो मातम का निशाँ है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है
सुग़रा ने लिखा खत में कि कब आओगे अकबर
कह कर ये गए थे मुझे ले जाओगे अकबर
मसरूफे सफर हो मुझे एहसास है भाई
आओगे मुझे लेने ये ही आस है भाई
कब आओगे कब आओगे कब आओगे अकबर
सुग़रा ने लिखा खत में कि कब आओगे अकबर
बाबा कभी अम्मू कभी याद आई सकीना
तुम जबसे गए हो गया वीरान मदीना
क्या आ के मदीने मुझे ले जाओगे अकबर
सुग़रा ने लिखा खत में कि कब आओगे अकबर
एक पल के लिए भी मेरा दिल ही नहीं लगता
फुरक़त में तुम्हारी यूँ ही मर जाऊँगी तनहा
बीमार हूँ कितना मुझे रुलवाओगे अकबर
सुग़रा ने लिखा खत में कि कब आओगे अकबर
सब साथ में होंगे मुझे राहत ही मिलेगी
बहना ये तुम्हारी कोई शिकवा ना करेगी
तुम मेरे लिए बाबा को समझाओगे अकबर
सुग़रा ने लिखा खत में कि कब आओगे अकबर
आँखें हैं लगी राह पे दिल रोता है मेरा
सोती नहीं रातों को ना दिन कटता है मेरा
वो हाल है तुम देख के घबराओगे अकबर
सुग़रा ने लिखा खत में कि कब आओगे अकबर
रोती थी तड़पती थी परेशान थी सुग़रा
आँखों में ज़ुहैर आँसू लिए कहती थी दुखिया
लगता है मैं मर जाऊँगी तब आओगे अकबर
सुग़रा ने लिखा खत में कि कब आओगे अकबर
कह कर ये गए थे मुझे ले जाओगे अकबर