Ya Nabi Ya Nabi Ya Nabi Ya Nabi

या नबी या नबी या नबी या नबी
या नबी या नबी या नबी या नबी
या नबी या नबी या नबी या नबी
या नबी या नबी या नबी या नबी

ये फलक ये ज़मीं चाँद सूरज सभी
ये समंदर ये तारों में सब रौशनी
सारी दुनिया तुम्हारे लिए है सजी
या नबी या नबी या नबी या नबी

आके दुनिया में रौशन जहाँ कर दिया
खाली दामन जो था इल्म से भर दिया
तुम जो आये तो पहचान रब की हुई
या नबी या नबी या नबी या नबी

कोई छोटा नहीं ना कोई है बड़ा
सबसे आला है कोई तो वो है खुदा
तुमसे सीखी तो आयी हमें बंदगी
या नबी या नबी या नबी या नबी

तुमको ताहा कहा और यासीन भी
मिलने तुमको बुलाया वो मेराज दी
फातिमा जैसी बेटी भी तुमको मिली
या नबी या नबी या नबी या नबी

एक इशारे से जिसने क़मर दो किया
उसको लोगो ने अपने ही जैसा कहा
कौन कर पायेगा आपकी हमसरी
या नबी या नबी या नबी या नबी

कितनी मोजिज़ नुमा आपकी ज़ात है
मुँह है छोटा ज़ुहैर और बड़ी बात है
मैं कहाँ और कहाँ आपकी नौकरी
या नबी या नबी या नबी या नबी

Ya Ali Ya Ali Ya Ali Ya Ali – Khaybar

या अली या अली या अली या अली
या अली या अली या अली या अली
या अली या अली या अली या अली

मेरा मौला अली मेरा आक़ा अली
आसमानो ज़मीं पर हुकूमत तेरी
दिन तेरी रौशनी रात मर्ज़ी तेरी
हर सितारों ने की है तेरी नौकरी
तेर सदक़े में नबियों की मुश्किल टली
या अली या अली या अली या अली

मैंने खैबर से जब पूँछा ये माजरा
जंग में क्या हुआ कुछ बता तो ज़रा
जब ना थे मुर्तज़ा तो लड़ा कौन था
इतने दिन क्यों लगे क्यों फतह ना हुआ
किसको खैबर में अहमद ने आवाज़ दी
या अली या अली या अली या अली

बोला खैबर के अल मुख़्तसर यूँ हुआ
जंगे का सारा नक़्शा था पलटा हुआ
लड़ने मरहब से कोई भी जाता ना था
लड़ने जाता था कोई तो टिकता ना था
एक भी तो ना था सब में कोई जरी
या अली या अली या अली या अली

सूरमा सब बने मात खाते रहे
झंडे जाते रहे डंडे आते रहे
मात खाते रहे मुँह छुपाते रहे
अपनी ना कामियां सब सुनाते रहे
मर्दे मैदाँ तो उनमे ना निकला कोई
या अली या अली या अली या अली

कितने असहाब थे सब बड़े से बड़े
सबसे आगे थे वो जो ससुर भी हुए
लड़ने वो भी गए थे बड़ी शान से
पहुँचे थे शान से पलटे हैरान से
बे ज़ुबाँ को सुनाने लगे जो खरी
या अली या अली या अली या अली

कितने हज़रात का आना जाना हुआ
ख़त्म हर एक का हर बहाना हुआ
दिन गुज़रते रहे एक ज़माना हुआ
पर खुदा ने था कुछ और ठाना हुआ
आए जिब्रील ले कर वहीं पर वही
या अली या अली या अली या अली

बोले अहमद अलम अब मैं दूँगा उसे
गैर ए फर्रार हो जीत हासिल करे
कितने अलक़ाब थे जो नबी ने कहे
एक लक़ब में भी हमसर ना छोटे बड़े
दिन वो ढलने लगा रात होने लगी
या अली या अली या अली या अली

उफ़ अलम की वो चाहत थी असहाब में
नींद सबकी उडी थी अलम के लियें
नींद कैसी खुली आँखों से खाब में
सोचते थे अलम कल मिलेगा हमें
सोचते सोचते ही सुबह हो गयी
या अली या अली या अली या अली

दिन जो निकला अज़ाने सहर जो हुई
तेज़ धड़कन जो थी तेज़ तर हो गयीं
हम को देंगे अलम बस गुमां था यही
जिस से डरते थे आखिर हुआ फिर वही
मुस्तफा ने पढ़ी फिर जो नादे अली
या अली या अली या अली या अली

वो सदा सुन के बे साख्ता आ गए
जंग लड़ने को मुश्किल कुशा आ गए
जबके बीमार थे मुर्तज़ा आ गए
थे मदीने में पेशे नबी आ गए
गर बुलाये नबी क्यों ना आये वसी
या अली या अली या अली या अली

नाम हैदर का जूं ही नबी ने लिया
जाने कितनो का चेहरा ही मुरझा गया
दिल की हर एक तमन्ना का खूं बह गया
जागना रात भर सब अकारत गया
थी अलम की जो चाहत यूँ ही रह गयी
या अली या अली या अली या अली

लड़ने मरहब से तनहा अली जो गए
सीना पत्थर का चीरा अलम के लिए
बोले हिम्मत हो जिसमें वो आके लड़े
जितने असहाब थे देखते रह गए
एक मरहब की दो लाश कैसे हुई
या अली या अली या अली या अली

एक इशारा अली ने जो दर को किया
दर जो चालीस लोगों से हिलता ना था
ए ज़ुहैर उस इशारे का था मोजिज़ा
दर वो दस्ते दरे इल्म पर आ गया
फिर तो माले गनीमत था और फ़ौज थी
या अली या अली या अली या अली

Matam Ke Roz Khatm Hue Eid Aa Gayi – Eid-e-Zehra

मातम के रोज़ ख़त्म हुए ईद आ गयी
हर मातमी के चेहरे पे मुस्कान छा गयी

तारीकयों से कह दो कहीं और जा बसें
सज्जाद मुस्कुरा दिए रौनक सी आ गयी

लहजे में मुर्तज़ा के जो खुत्बा सुना गयी
फ़र्शे अज़ा यज़ीद के घर में बिछा गयी

बेटी अली की क़स्रे खलीफा गिरा गयी
औक़ात क्या है ज़ुल्म की सबको दिखा गयी

शोले दबा के शाम के ज़िन्दाँ जो आयी थी
क़स्रे यज़ीद सारा का सारा जला गयी

नारा अली का नस्लों का है आइना ए शेख
माथे की एक शिकन कई सदियां दिखा गयी

अजदाद जिनके ग़ार में रोए थे दोस्तों
ज़हरा की ईद आई तो उनको रुला गयी

अम्मा पुकारता है ज़माना उसे ज़ुहैर
जंगे जमल में लड़ने अली से जो आ गयी

Aza-e-Shah ko hi bas apna ham safar rakhna

अज़ा ए शह को ही बस अपना हम सफर रखना
नजफ़ से हो जो शुरू ऐसी रह गुज़र रखना

सलाम करना शहीदों को और असीरों को
सफर में अपने क़दम तुम जिधर जिधर रखना

सफर हो हुज्जते आखिर के साथ में अपना
इलाही मेरी दुआओं में वो असर रखना

सना जो करना हो अब्बास की तो याद रहे
तुम अपने ज़ेर भी अशआर में ज़बर रखना

हो जब भी ज़िक्र कहीं प्यास का मुसीबत का
तो खुल के रोने रुलाने में ना कसर रखना

सकीना कहती थी जब शाहे दीं चले रन को
हुई जो शाम तो बाबा मेरी खबर रखना

कहा ये शह ने सकीना कटेगा सर मेरा
पड़ा मिले मेरा लाशा तो अपना सर रखना

जलेगा आग से दामन तेरा मेरी दिलबर
जो छीने बालियाँ कोई तो तुम सबर रखना

ज़ुहैर तुमको ज़माना अगर सताने लगे
असीरे शाम की ग़ुरबत पा भी नज़र रखना

Amal Se Kab Wahan Kirdaar Samjha Ja raha hai

अमल से कब वहाँ किरदार समझा जा रहा है
रहज़नो को जहाँ सरदार समझा जा रहा है

नहीं मालूम जिसका हुर है या वो हुरमुला है
भला कैसे वो मातमदार समझा जा रहा है

खुद अपनी कोम को जाहिल दिखा कर सबके आगे
खुद अपने आप को हुशियार समझा जा रहा है

ज़रा सी मालो दौलत और इनकी चापलूसी
ख़याल ए खाम भी हथियार समझा जा रहा है

मेरे माबूद आखिर कब तमाशा ख़त्म होगा
अज़ादारी है क्यों त्योहार समझा जा रहा है

तमाशा करने वालों को खबर दे दो ज़ुहैर अब
ये ना समझें उन्हें दम दार समझा जा रहा है

Rehaee Jo Qaide Sitam se Milegi to Phele Gham-e-Shah Manayegi Zainab

रिहाई जो क़ैद ए सितम से मिलेगी तो पहले ग़मे शह मनाएगी ज़ैनब
नहीं रो सकी है ये भाई को अपने ज़रा खुल के आँसू बहायेगी ज़ैनब

ना चादर थी बाक़ी ना बाज़ू खुले थे जो मातम ये भाई का करती तो कैसे
मिलेगी रिहाई जो ज़ुल्मो सितम से तो फ़र्शे ग़मे शह बिछाएगी ज़ैनब

मदीने से पहले ये दश्ते बला में शहीदों के मरक़द पे आहो फ़ुग़ाँ में
जो ज़िन्दाँ में गुज़रे हैं रंजो मसायब शहे कर्बला को सुनाएगी ज़ैनब

वो माटी के बिस्तर पे बच्चों का सोना सकीना का रोना तुम्हारा ना होना
ये ही सोचती थी अँधेरे में तनहा भला इसको कैसे सुलाएगी ज़ैनब

नहीं सो सकी थी जुदा होके तुमसे वो ज़िन्दाँ में सोती है बच्ची तुम्हारी
सुला आयी उसको अँधेरे मकां में भला किस तरह ये बताएगी ज़ैनब

सितम ज़ालिमों के ना सह पाई बच्ची जुदा होके तुमसे ना रह पाई बच्ची
जगाया बहुत मैंने भाई ये कह कर तुम्हारे बिना कैसे जायेगी ज़ैनब

हमें ज़ालिमों ने सताया है भाई बे मखना बे चादर फिराया है भाई
बचाया है दीं तुमने अपने लहु से तुम्हारी शहादत बचाएगी ज़ैनब

है सैलाब सीने में भाई के ग़म का मुसीबत का फुरक़त का रंजो अलम का
कहीं छुप ना जाए शहे दीं का क़ातिल अज़ाख़ाना पहले बनाएगी ज़ैनब

ये फ़र्शे अज़ा यूँ ही बिछती रहेगी सितम ज़ालिमों के ये सबसे कहेगी
ज़ुहैर अपनी आँखों से आँसु बहाओ नक़ाबें सितम की उठाएगी ज़ैनब

Besheer Kahan Hai Mera Besheer Kahan Hai

बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है
किस जा तुझे ढूंढेगी परेशान ये माँ है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है

सेहरा है बियाबान है दिल रोता है असगर
सब जंग के सामान हैं पुर हौल समाँ है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है

सुनती हूं के मैदान में तीरों से लड़ा है
छः माह का बच्चा वो मेरा तश्ना दहाँ है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है

क्या लाल मेरे भाई से मिलने को गए हो
हमशक्ल ए पयंबर के भी सीने में सिना है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है

खेमों को जलाया तेरा झूला भी जलाया
दिखता नहीं कुछ भी मेरी आँखों में धुआँ है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है

ता हश्र सदा साथ रहेगी ये आलम के
इस मश्क ए सकीना में अलमदार की जाँ है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है

पानी लिए कूज़े में बहन ढूंढ रही है
खुद प्यासी है कहती है मेरा भाई कहाँ है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है

रोते हैं शब्बो रोज़ परिंदे तुम्हें असग़र
ये गिरया कुनाँ ग़म में तेरे इनकी ज़बाँ है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है

एक माँ की मुसीबत को बयान कैसे करे हम
सैलाब सा हर फ़र्द की आँखों से रवाँ है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है

कुछ डर नहीं मरक़द के अँधेरों का ज़ुहैर अब
रौशन मेरे सीने पे जो मातम का निशाँ है
बेशीर कहाँ है मेरा बेशीर कहाँ है

Sughra ne likha khat mian ke kab aaoge Akbar

सुग़रा ने लिखा खत में कि कब आओगे अकबर
कह कर ये गए थे मुझे ले जाओगे अकबर

मसरूफे सफर हो मुझे एहसास है भाई
आओगे मुझे लेने ये ही आस है भाई
कब आओगे कब आओगे कब आओगे अकबर
सुग़रा ने लिखा खत में कि कब आओगे अकबर

बाबा कभी अम्मू कभी याद आई सकीना
तुम जबसे गए हो गया वीरान मदीना
क्या आ के मदीने मुझे ले जाओगे अकबर
सुग़रा ने लिखा खत में कि कब आओगे अकबर

एक पल के लिए भी मेरा दिल ही नहीं लगता
फुरक़त में तुम्हारी यूँ ही मर जाऊँगी तनहा
बीमार हूँ कितना मुझे रुलवाओगे अकबर
सुग़रा ने लिखा खत में कि कब आओगे अकबर

सब साथ में होंगे मुझे राहत ही मिलेगी
बहना ये तुम्हारी कोई शिकवा ना करेगी
तुम मेरे लिए बाबा को समझाओगे अकबर
सुग़रा ने लिखा खत में कि कब आओगे अकबर

आँखें हैं लगी राह पे दिल रोता है मेरा
सोती नहीं रातों को ना दिन कटता है मेरा
वो हाल है तुम देख के घबराओगे अकबर
सुग़रा ने लिखा खत में कि कब आओगे अकबर

रोती थी तड़पती थी परेशान थी सुग़रा
आँखों में ज़ुहैर आँसू लिए कहती थी दुखिया
लगता है मैं मर जाऊँगी तब आओगे अकबर
सुग़रा ने लिखा खत में कि कब आओगे अकबर
कह कर ये गए थे मुझे ले जाओगे अकबर

Yakko tanha jo khada hai kaun ye Sardaar hai?

यक्को तनहा जो खड़ा है कौन ये सरदार है
ज़ालिमों का दिल हिलाती किसकी ये यलगार है

अज़्म इसमें कर्बला का हौसला शब्बीर का
ये अली का शेर है जो बर सर-ए-पैकार है

ओ ज़माने के यज़ीदों है अली इब्ने अली
नाम इसका खामनाई शाह का मातमदार है

बुग़्ज़-ए-हैदर का असर है छुप नहीं सकता कभी
फिर सऊदी कह रहा है जंग-ए-इक़्तेदार है

हैं पचासों मुल्क जिनके हुक्मरां हैं कलमा गो
ज़ुल्म का हामी है जो भी दीन का गद्दार है

दुश्मन-ए-आले नबी जो तू नहीं तो वार कर
चूड़ियां हैं हाथ में या मोम की तलवार है

ज़ुल्म के आगे तो हमने सर झुकाया ही नहीं
कर्बला से आज तक इंकार था इंकार है

लो बहाया जा रहा है फिर से खूने बे-खता
बारिशें अब खून की होंगी यही आसार है

मैं तो अपने मुल्क से भी यही कहता हूं जुहैर
जिस का साया सर पे है वो रेत की दीवार है

Phir se Shaitaan ne Iraan ko Dhamkaya Hai

लो मियां बैअत ए फासिक़ का सवाल आया है
फिर से शैतान ने ईरान को धमकाया है

अहले बातिल के लिए सर नहीं झुकता अपना
शह का फरमान है ये हमने तो दोहराया है

देख लो कौन हैं नारी तो अकेला है कौन
किस के काँधे पा अलम हक़ का नज़र आया है

अहले बातिल के लिए सर नहीं झुकता अपना
शह का फरमान है ये हमने तो दोहराया है

ग़ासिब ए हक़ के तरफ़दार हैं दुनिया वाले
पर जो ग़ासिब है वो ईरान से घबराया है

हाज क़ासिम भी नहीं और ना हसन नसरुल्लाह
मुन्तज़िर जिसके थे वो वक़्त तो अब आया है

धमकियाँ देता है शैतान का फ़रज़न्द हमें
खात्मा अपना ये खुद उसने ही बुलवाया है

हम दिफ़ा करते हैं हमला नहीं करते हैं कभी
हमला मजबूरी है वो घर में ही घुस आया है