यक़ी जिनको नहीं वो आ रहे हैं
वो ही तो क़ोम को भटका रहे हैं
अज़ानों और अक़ामत पर भी झगडे
तमाशा कोम का बनवा रहे हैं
फ़क़त भूके हैं और प्यासे हैं दिन भर
ये रोज़े क्या हमें सिखला रहे हैं
अना को छोड़ दें आओ सभी हम
हसन भी तो ये ही समझा रहे हैं
सजा है जश्न सिब्ते मुस्तफा का
अली ओ फातिमा खुद आ रहे हैं
मोहम्मद को जो अब्तर कह रहे थे
हसन को देख कर घबरा रहे हैं
ये फन देखो ज़रा सुल्ह ए हसन का
क़लम से सर उड़ाए जा रहे हैं
शऊर ओ अज़्म में इल्मो अमल में
अली वाले सदा आला रहे हैं
हमारे हौसले दुनिया से पूछो
अकेले हो के भी हड़का रहे हैं
यक़ीनी मौत फिर टूटेगी सर पर
अभी तो बस तुम्हें समझा रहे हैं