Sila Madh-e-Hasan Ka Paa Rahe Hain

यक़ी जिनको नहीं वो आ रहे हैं
वो ही तो क़ोम को भटका रहे हैं

अज़ानों और अक़ामत पर भी झगडे
तमाशा कोम का बनवा रहे हैं

फ़क़त भूके हैं और प्यासे हैं दिन भर
ये रोज़े क्या हमें सिखला रहे हैं

अना को छोड़ दें आओ सभी हम
हसन भी तो ये ही समझा रहे हैं

सजा है जश्न सिब्ते मुस्तफा का
अली ओ फातिमा खुद आ रहे हैं

मोहम्मद को जो अब्तर कह रहे थे
हसन को देख कर घबरा रहे हैं

ये फन देखो ज़रा सुल्ह ए हसन का
क़लम से सर उड़ाए जा रहे हैं

शऊर ओ अज़्म में इल्मो अमल में
अली वाले सदा आला रहे हैं

हमारे हौसले दुनिया से पूछो
अकेले हो के भी हड़का रहे हैं

यक़ीनी मौत फिर टूटेगी सर पर
अभी तो बस तुम्हें समझा रहे हैं

Bhala kyun deed se tarsa rahe hain

ज़माने पर वो ही तो छा रहे हैं
जो सो कर मर्ज़ी ए रब पा रहे हैं

मलक उनके ही दर पर आ रहे हैं
लिबास ए खुल्द जो मँगवा रहे हैं

जिन्होंने दर जलाया फातिमा का
भला अब वो भी जन्नत जा रहे हैं

बशारत खुल्द की मिलती है ऐसे
लो देखो हुर को वो अपना रहे हैं

जो राहे हक़ में सर कटवा रहे हैं
वो ही नेज़े पा चलकर आ रहे हैं

मुक़द्दर अपना वो चमका रहे हैं
नजफ़ से कर्बला जो जा रहे हैं

अक़ीदत में कमी है कुछ हमारी
यूँ ही वो दीद से तरसा रहे हैं

Madar-e-Fatima Khadija Hain

क्या कहूं तुमसे क्या खदीजा हैं
नूर-ए-राह-ए-हुदा खदीजा हैं

हम सर ए मुस्तफा खदीजा हैं
मादर ए फातिमा खदीजा हैं

दीन मोहसिन है मोमिनो सच है
दीन की मोह सिना खदीजा हैं

मालो दौलत लुटाई है दीं पर
अस्ल-ए-ख़ैर-ओ-अता ख़दीजा हैं

माल ही क्या, थी जान भी हाज़िर
अज़्म की इंतिहा ख़दीजा हैं

थी जो मूनिस नबी की हर लम्हा
नूर ए सब्र ओ रज़ा खदीजा हैं

इंतिहा ये ज़ुहैर अज़मत की
पहली जो मोमिना, खदीजा हैं

Hasan Noor-e-Khuda Ki Raushni hai

नबी से इश्क़ ओ उल्फत, आगही है
नबी पर जान देना, ज़िन्दगी है
नबी का हर अमल, रब की वही है
नहीं इनकी नहीं, रब की नहीं है

नबी का जा नशी वाहिद अली है
अली जैसा नहीं कोई नहीं है

अली हर हाल में हक़ का वली है
अली के नाम से मुश्किल टली है
अली ने तो मदद नबियों की की है
अली का ज़िक्र रब की बंदगी है

अली जिसको समझ आता नहीं है
खता ये माँ की है उसकी नहीं है

मेरी माँ ने मुझे ये सीख दी है
नहीं दिल में अली तो तीरगी है
सहारा बे सहारों का अली है
हर एक ग़म की दवा नादे अली है

बशर गिरते हुआ गिरता नहीं है
कहा बेसाख्ता जब या अली है

मदीने में ये ही होता था अक्सर
नबी को लोग कुछ कहते थे अब्तर
ये ताना बार था अहमद के दिल पर
लिए मायूस दिल आये जो घर पर

कहा ख़ालिक़ ने ए जिब्रील जाओ
मेरे मेहबूब को कौसर सुनाओ

लिए जिब्रील कौसर आए दर पर
कहा मायूस ना हों ए पयम्बर
खुदा ने आपको भेजा है कौसर
कहा जिसने रहेगा वो ही अब्तर

नबूअत जो खतम तुम पर करुंगा
तुम्हारे लाल मैं ज़ेहरा को दूँगा

वो ज़ेहरा जो के है उम्मे अबीहा
है सर पर ताज ख़ातूने जिना का
नबी की नस्ल को जिसने चलाया
जहाँ में नाम है दो लाडलों का

इमामत इनके आँगन में पली है
विलायत जिनसे दुनिया को मिली है

हसन जाने अली सिब्ते नबी है
हसन खुद भी वली इब्ने वली है
हसन जैसा किसी का हुस्न भी है
हसन नूर ए खुदा की रौशनी है

मलक इनके ही दर पर आ रहे हैं
लिबास ए खुल्द ये मँगवा रहे हैं

हसन ने सुल्ह कर के दीं बचाया
किया वो वार कुछ भी बच ना पाया
अमीर ए शाम को क़ैदी बनाया
क़लम की नोक से यूँ सर उड़ाया

ज़ुहैर इस सुल्ह की हिकमत यही है
सितम का धड़ कहीं गर्दन कहीं है

Yun to Jalva Dekhte hain, Roo ba Roo Dekha Nahi

ज़िक्र-ए-अहले बैत जिनको एक नज़र भाता नहीं
नूर-ए-हक़ का उन अंधेरों से कोई रिश्ता नहीं

डर तुझे किस बात का है क्यों भला कहता नहीं
तू फ़ज़ाइल मुर्तज़ा के खोल कर पढता नहीं

अपनी मर्ज़ी बेच दी ख़ालिक़ ने सोने के एवज़
और मर्ज़ी मोल लेकर भी अली मौला नहीं

गर ना होती मर्ज़ी ए रब मुर्तज़ा के हाथ में
फिर नुसैरी भी अली को यूँ खुदा कहता नहीं

गर अली दिल में समां जाए तो ये देखा गया
दार से मदह-ओ-सना करके बशर मरता नहीं

बे विला तो जो भी हो वो हर अमल बेकार है
हज कहाँ फिर हज रहा उमरा भी तो उमरा नहीं

परदे-ए-ग़ैबत से भी वो नूर-ए-हक़ ज़ौ-बार है
यूँ तो जलवे देखते हैं, रूबरू देखा नहीं

खून ए हैदर दिख रहा है आज तक मेहराब में
मस्जिदों में बम धमाके आज का मसला नहीं

ये ख़बर दे दो यज़ीदान-ए-जहाँ को भी ज़ुहैर
बम धमाकों से भी अपना हौसला झुकता नहीं

Zulmaten Sab Door Hongi Aur Ujale Aayenge

देख लेना के मुनाफ़िक़ ख़ुद-ब-ख़ुद मर जाएँगे
बद नसब तो नारा ए हैदर से ही डर जाएँगे
और ज़ालिम नस्ल के पत्ते तलक गिर जाएँगे
क़ायम-ए-आल-ए-मुहम्मद ग़ैब से जब आएँगे
ज़ुल्मतें सब दूर होंगी और उजाले आएँगे

अपने जद सा अद्ल लेकर आएँगे मेरे इमाम
सारी दुनिया देख लेगी फिर से हैदर का निज़ाम
बहर ए हक़ महदी करेंगे हक़ का सारा इंतज़ाम
क़हर बनकर ज़ुल्म पर जब वो अदालत लाएँगे
ज़ुल्मतें सब दूर होंगी और उजाले आएँगे

अंबिया आकर खड़े होंगे वहाँ पर सफ़-ब-सफ़
सबसे पहले ख़ाना-ए-हक़ को मिलेगी ये शरफ़
नूर-ए-हक़ दुनिया में फैलेगा यहीं से हर तरफ़
ख़ाना-ए-काबा की छत पर जब अलम लहराएँगे
ज़ुल्मतें सब दूर होंगी और उजाले आएँगे

या इलाही कर अता इस बे-क़रारी को क़रार
ख़त्म कर दे आख़री हुज्जत का अब तो इंतज़ार
ख़ून की प्यासी है सदियों से अली की ज़ुल्फ़िकार
ख़ौफ़ के साए मिटेंगे, हौसले बढ़ जाएँगे
ज़ुल्मतें सब दूर होंगी और उजाले आएँगे

रह के परदे में हमारी हर ख़बर रखता है जो
जो ख़यालों में बसा है, दिल में भी गहरा है जो
वो रुख़-ए-अनवर दिखा दे, यूसुफ़-ए-ज़हरा है जो
रौज़ा-ए-मिस्मार पर फिर से बहारें लाएँगे
ज़ुल्मतें सब दूर होंगी और उजाले आएँगे

है दुआ इतनी के जब तक दम में दम होगा ज़ुहैर
नुसरत-ए-हुज्जत का जज़्बा कम नहीं होगा ज़ुहैर
मर गए जो हम तो फिर हम पर करम होगा ज़ुहैर
क़ब्र से हमको उठाने ख़ुद फ़रिश्ते आएँगे
ज़ुल्मतें सब दूर होंगी और उजाले आएँगे

Ali Akbar Main Husn-e-Ahmad-e-Mukhtaar Milta Hai

शबीह-ए-मुस्तफ़ा का ये निराला वार मिलता है
सितम का सारा लश्कर सरहदों से पार मिलता है

बहत्तर कोशिशे कर ली बहत्तर बार हारा है
सितम हैरान है हर बार ही इंकार मिलता है

अली वाले का दुनिया में ये ही किरदार मिलता है
नई मिदहत सुनाता है उसे जब दार मिलता है

भले सूली चढ़ाए या हमारी जान ही ले ले
क़लम कर दे ज़बाँ फिर भी, उसे इंकार मिलता है

वो असग़र हों या अकबर हों या फिर इब्ने मज़ाहिर हों
अलग हर सिन में नुसरत का वही मेयार मिलता है

अगर साया ना होता तो मुकम्मल मुस्तफा होते
अली अकबर में हुस्ने अहमद ए मुख़्तार मिलता है

अज़ान ए सुबह ए आशूरा ये कहती ज़ुहैर हमसे
शऊर ए हक़ जो रखता है वो ही बेदार मिलता है

Awwal Tumhen Aana Hai, Aakhir Tumhen Aana Hai

आला ये घराना था, आला ये घराना है
हर दौर ने माना था, हर दौर ने माना है

परदे में अभी क़ायम अहमद की निशानी है
रौशन वो ज़माना था, रौशन ये ज़माना है

है कैसा मुसलमां वो, पढ़ता है नमाज़ें तो
अहमद की ना माना था, हैदर को ना माना है

जिब्रील हों, काबा हो, मस्जिद हो या मिम्बर हो
हैदर का दिवाना था हैदर का दिवाना है

अव्वल तुम्हें आना है, आखिर तुम्हें आना है
कल कलमा पढ़ाया था, अब पर्दा उठाना है

तौहीद बताने को फिर उसको बचाने को
अव्वल तुम्हें आना है आखिर तुम्हें आना है

मजलिस का तबर्रुक हो, अश्क-ए-ग़म-ए-सर्वर हो
अनमोल खज़ाना था अनमोल खज़ाना है

ज़हरा ओ अली, शब्बर-शब्बीर के क़ातिल का
अंदाज़ ज़नाना था अंदाज़ ज़नाना है

आपस में लड़ाए वो, या बाग़े फ़िदक लूटे
दोज़ख में ही जाना था दोज़ख में ही जाना है

ये काम बड़े लेकर आये हैं अली असग़र
बैअत को हराना था, ज़ालिम को रुलाना है

हर दौर के मरजा पर, या फ़र्श-ए-ग़म-ए-शह पर
ज़ालिम का निशाना था ज़ालिम का निशाना है

क्यों उनको बुलाना है आना ही नहीं जिनको
कल कोई बहाना था अब कोई बहाना है

हर दौर में ये सबकी नस्लों का पता देगा
खैबर में जो पाया था, नारा वो लगाना है

कहता है ज़ुहैर अब भी ग़ाज़ी का अलम हमसे
सर को ना झुकाया था सर को ना झुकाना है

Shah Ka Gham Farshe Aza Zaiban Ka Tha Zainab Ka Hai

शह का ग़म फ़र्शे अज़ा ज़ैनब का था ज़ैनब का है
हश्र तक ये सिलसिला ज़ैनब का था ज़ैनब का है

बाप की ज़ीनत है और मक़सद ए शह की अमीन
मर्तबा ये बा खुदा ज़ैनब का था ज़ैनब का है

काम जिसने ले लिया शमशीर का तक़रीर से
क़ैद में वो हौसला ज़ैनब का था ज़ैनब का है

मुफ्तिए बिदअत तेरे फतवों ने ज़ाहिर कर दिया
खौफ तारी ज़ुल्म पा ज़ैनब का था ज़ैनब का है

हक़ परस्ती, शह का मक़सद, कर्बला से खुल्द तक
इस सफर का रास्ता ज़ैनब का था ज़ैनब का है

मदह खानी शह का मातम जज़्बा ए नुसरत ज़ुहैर
जो करम तुझ पर हुआ ज़ैनब का था ज़ैनब का है

Ameen e Maqsad e Shabber hain Zainab

अमीने मक़सद ए शब्बीर हैं ज़ैनब
अली की बोलती तस्वीर हैं ज़ैनब

अली ओ फातिमा शब्बीर ओ शब्बर के
चमकते नूर की तनवीर हैं ज़ैनब